नाथपंथ और गोरख-साहित्य

Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 1 (January - March 2026)
Article Title

नाथपंथ और गोरख-साहित्य

Author(s) कृष्ण कुमार मुक्कड़, डॉ. अखिलेश चास्टा.
Country India
Abstract दिए गए आलेख में नाथपंथ और गोरखनाथ के साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक योगदान का विस्तृत विवेचन किया गया है। नाथ परंपरा को एक प्राचीन शैव-आधारित योगपरक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसके आदि प्रवर्तक आदिनाथ (शिव) माने जाते हैं तथा जिसे मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ ने व्यवस्थित एवं व्यापक रूप प्रदान किया। गोरखनाथ ने बौद्ध वज्रयान और वाममार्गी साधनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप हठयोग, ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-निग्रह और मानसिक-शारीरिक शुचिता पर बल दिया। गोरखनाथ का योगदान केवल धार्मिक या साधनात्मक नहीं, बल्कि साहित्यिक और भाषिक भी है। उन्होंने खड़ी बोली और सधुक्कड़ी जैसी लोकाभिमुख भाषा का प्रयोग कर हिंदी को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में गुरु-महिमा, योग-साधना, कुण्डलिनी जागरण, नाड़ी साधना, निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा, उलटबांसी, लोकोक्तियाँ और सामाजिक पाखंड का विरोध प्रमुख विषय हैं। गोरखबानी का संकलन नाथ साहित्य की प्रामाणिक धरोहर माना जाता है। नाथ साहित्य ने लोकभाषाओं, लोकसंस्कृति और संत काव्य पर गहरा प्रभाव डाला तथा भक्तिकालीन ज्ञानमार्गी परंपरा को दिशा प्रदान की। सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते हुए गोरखनाथ की वाणी ने निम्न और उपेक्षित वर्गों को भी वैचारिक संबल दिया। इस प्रकार नाथपंथ और गोरख-साहित्य भारतीय ज्ञान-परंपरा, योग-दर्शन और हिंदी साहित्य के विकास में एक स्थायी, प्रासंगिक और प्रेरणादायक भूमिका निभाते हैं।
Area हिन्दी साहित्य
Issue Volume 2, Issue 4 (October - December 2025)
Published 2025/12/28
How to Cite मुक्कड़, कृष्ण कुमार, एवं चास्टा, अखिलेश. (2025). नाथपंथ और गोरख-साहित्य. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 136-140.

PDF View / Download PDF File