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Author(s):
नेहा चौबे.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-6 |
धूमिल के काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोण
Abstract
शोध सार - समकालीन कविता में धूमिल मील के पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित हुए है। इनके बिना समकालीन कविता की मुकम्मल तस्वीर बनती दिखाई नहीं देती। धूमिल की कविताओं में आम जनता, किसान, मजदूर, श्रमिक और उपेक्षित लोग जिनका निर्ममता से शोषण किया जा रहा हैं, उनके प्रति अपनी आवाज को निर्भयता और दृढ़ता से उठाने का प्रयास किया है। धूमिल ने सर्वहारा वर्ग के प्रति मानवीय संवेदना तथा सदियों से हो रहे शोषण को अपनी कविताओं का विषय बनाया हैं। वह शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति के साथ अपनी वेदना को वाणी देने का प्रयास किया हैं। जनशक्ति को बढ़ाने के लिए अपनी कविता को आधार बनाया हैं। शोषित वर्ग, पूंजीवादी तथा सत्ताधारी वर्ग का विरोध किया हैं। हिंसा का विरोध करते हुए अहिंसा को मानवतावाद से सफलतापूर्वक जोड़ने की कोशिश करना चाहते हैं। इनकी कविता आम जनता को मानवीय मूल्यों की गहराई तक पहुंचती हैं और उन्हें स्थापित भी करती हैं। इनकी कविता समाज,व्यवस्था तंत्र और राजनीतिक पृष्ठभूमि को उजागर करती है। उनकी कविता आम आदमी के अनुभव को महसूस करती हैं, और उस परिस्थितियों की ज्वाला को आत्मसात भी करती हैं। वह समस्त जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त अपनी कविताओं के माध्यम किया हैं। उनकी कृति भारतीय जनतंत्र में स्वतंत्रता, न्यायपूर्णता,समानता, बंधुत्वता और धर्मनिरपेक्षता को काफी महत्व देने का प्रयास करती है। मूलरूप से स्वतंत्रता के पश्चात् समाज में पूंजिवादी व्यवस्था का विकास तथा जनसाधारण का शोषण के विरुद्ध की वाणी इस दौर के कविताओं में प्रकाशित होती हैं। उनकी कविताओं के माध्यम से जनता के आशा की अभिव्यक्ति को स्पष्ट रूप से पाठक तक पहुंचाया जा सकता हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि समकालीन कवियों की दृष्टि काफी व्यापक और सजग हैं। इनकी वैचारिक दृष्टि और भाषा सरल होने के बावजूद भी पाठक के हृदय स्थल को उद्वेलित करती है। धूमिल प्रगतिशील लेखन सम्मेलन से जुड़े थे तथा सभी जगह अपनी संलग्नता और तीक्ष्णता का परिचय दिया हैं। समकालीन हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, अरुण कमल, चंद्रकांत देवताले और राजेश जोशी का प्रमुख स्थान हैं। इन कवियों में मोहभंग, जनतंत्र, शोषण और आक्रोश के दौर में व्यवस्था के विरुद्ध आम आदमी की पीड़ा और यथार्थवादी भाव को व्यक्त किया हैं।
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Author(s):
डॉ. पुष्प लता कुमारी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
7-11 |
रेहन पर रग्घू में ग्रामीण एवं आधुनिक परिवेश के बीच बनते-बिगड़ते रिश्ते
Abstract
काशीनाथ सिंह द्वारा रचित ‘रेहन पर रग्घू' अपने समय की उत्कृष्ट कृति है। यह अत्यंत गंभीर विषय एवं बदलते सामाजिक मूल्य पर आधारित उपन्यास है। आज के संदर्भ में यह उपन्यास अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह ‘व्यक्ति के अकेलेपन‘ को चरितार्थ करती है। परिस्थितिवश गाँव एवं शहर में परिवारों के दो अलग-अलग स्थानों पर रहने से आपसी समन्वय की कमी देखने को मिलती है। समयाभाव, व्यस्तता, आधुनिक जीवन की लालसा, इच्छाशक्ति में कमी एवं बात-व्यवहार के कारण व्यक्ति परिवार से दूर हो अकेलेपन का शिकार हो जाता है। उपन्यासकार ने रघुनाथ के माध्यम से उसके अकेलेपन एवं संघर्ष को दर्शाने का प्रयास किया है। परिस्थितिवश अपने भरे-पूरे परिवार जिसमें पत्नी, दो बेटे और एक बेटी होने के बावजूद भी रघुनाथ को बुर्जुगावस्था में अकेले जीवन जीने को विवश होना पड़ता है। जिस उम्र में व्यक्ति को अपने परिवार के साथ और सहयोग की आवश्यकता होती है, उस उम्र में व्यक्ति का अकेले जीवन व्यतीत करना बङा कष्टकारक होता है। ‘व्यक्ति का अकेलापन‘ आज के समाज के लिए अत्यंत सोचनीय, गंभीर एवं खतरनाक अवस्था है क्योंकि आज नयी पीढी इसी ढर्रे पर चल रही है। आज व्यक्ति को अपने बुर्जुगों से सम्मान, प्यार अपनापन और साझेदारी बना कर रखना चाहिए जिससे उनका जीवन आसानी से कट सके। काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास में विविध पात्रों के माध्यम से आधुनिक जीवन की इस विङम्बना का विस्तृत विवेचन किया है।
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Author(s):
अमर बहादुर.
Country:
India
Research Area:
दर्शनशास्त्र
Page No:
12-19 |
महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन: सिद्धांत और व्यवहारिकता का विश्लेषण
Abstract
यह शोध पत्र महात्मा गांधी के शिक्षा दर्शन के सिद्धांतों एवं उसकी व्यवहारिकता का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधीजी ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का साधन न मानकर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम माना है, जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों आयामों का संतुलित विकास शामिल है। उनके शिक्षा दर्शन का प्रमुख आधार ‘नई तालीम’ है, जो कार्य-आधारित शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा नैतिक मूल्यों पर आधारित है। इस अध्ययन में गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों जैसे—सत्य, अहिंसा, श्रम की गरिमा, मातृभाषा में शिक्षा तथा चरित्र निर्माण—का विश्लेषण किया गया है। शोध में गुणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों, जैसे पुस्तकों, शोध पत्रों एवं सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि गांधीवादी शिक्षा सिद्धांत व्यवहार में किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गांधीजी का शिक्षा दर्शन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर वर्तमान समय में जब शिक्षा अधिकतर परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 में भी गांधीवादी शिक्षा के तत्व, जैसे कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम तथा मूल्य-आधारित शिक्षा, स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। हालांकि, आधुनिक तकनीकी युग में गांधीवादी शिक्षा के पूर्ण कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे संसाधनों की कमी, पारंपरिक शिक्षा प्रणाली का प्रभुत्व तथा तकनीकी शिक्षा के साथ संतुलन की आवश्यकता। अतः यह कहा जा सकता है कि यदि गांधीजी के शिक्षा सिद्धांतों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कर लागू किया जाए, तो यह शिक्षा प्रणाली को अधिक मानवीय, व्यावहारिक एवं प्रभावी बना सकता है।