| Paper Title | बल्लभ डोभाल की कहानियों में वृद्ध जीवन की अभिव्यक्ति |
| Author(s) | कोमल. |
| Country | India |
| Abstract | वृद्धावस्था जीवन का वह समय है। जब अनुभवों का सूर्य अपनी स्वर्णिम लालिमा से वर्तमान को आलोकित करता हुआ प्रतीत होता है और उनकी ज्ञान की शीतल छाया भावी पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शिका बनकर जीवन में उचित-अनुचित का मार्ग प्रशस्थ कराती जाती है। इस समय जब परंपराओं का प्रहरी और जीवन के अनमोल सबक का संवाहक अपने जीवनानुभवों को अपनी अगली पीढी़ को हस्तांतरित करने की स्थिति में होता है तब यह प्रश्न उठता है कि उसका वह अनुभव भावी पीढ़ी के लिए कितना उपयोगी होगा ? समाज का एक क्रूर नियम है कि किसी की उपयोगिता समाप्त होते ही उसकी उपेक्षा होने लगती है यही स्थिति समाज में बुजुर्गों की भी रही है। आधुनिक युग के बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में बुजुर्ग व्यक्तियों की उपेक्षा, उनका अकेलापन और असुरक्षा की छाया में जीवनयापन करने की उनकी विवशता ने उनको भी हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस विसंगति का प्रतिबिंब साहित्य में भी दिखायी देता है। हिंदी साहित्य वृद्धों की समस्याओं को लेकर जागरूक दिखायी देता है। विशेषकर प्रेमचंद इस दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण साहित्यकार रहे हैं। उनके कथासाहित्य में वृद्ध विमर्श उभरता हुआ दिखायी देता है। प्रेमचंद की 'बूढी़ काकी' कहानी में एक वृद्धा की मार्मिक कहानी व्यक्त हुई है। वहीं ज्ञानरंजन की 'पिता' कहानी में पिता-पुत्र के संबंधों में पीढ़ीगत अंतराल को देखा जा सकता है। जिसमें दोनों ही अपने-अपने स्तर पर सही होते हुए भी एक- दूसरे के विपरीत दिखायी देते हैं। नरेंद्र कोहली की 'शटल' कहानी में बच्चे माता- पिता को अलग-अलग करके अपने -अपने साथ ले जाते हैं। इस कहानी में वृद्धावस्था में अपनी इच्छा को घोटकर बच्चों की खुशी के प्रति वृद्ध माता- पिता के समर्पण के भाव का उल्लेख हुआ है। भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत' कहानी में वृद्ध माँ को बेकार वस्तु की भाँति घर में छुपाने का प्रयास चलता है ताकि माँ चीफ के नजरों में न दिखायी दे, परन्तु माँ अनपढ़ होते हुए भी फुलकारी की कला में निपूर्ण होती है, जिससे चीफ प्रभावित होकर (शामनाथ) का प्रमोशन करता है। इस कहानी में पारिवारिक मूल्यों की गिरावट को देखा जा सकता है। वहीं ऊषा प्रियंवदा की 'वापसी' कहानी में सेवानिवृत्त वृद्ध की समस्याओं का वर्णन किया गया है। इस कहानी का नायक नौकरी से रिटायर होने के पश्चात् परिवार में अपनी जगह तलाशता दिखायी देता है, जिस कारण उसे दूसरी नौकरी की तलास करनी पड़ती है। इस प्रकार की अनेक कहानियाँ हिंदी साहित्य में मार्मिक ढंग से लिखी गयी हैं जो वृद्धों के विभिन्न पक्षों व समस्याओं को पाठक तक संप्रेषित करती हैं। वृद्ध जो कभी अपने परिवार और समाज को दिशाबोध कराते थे, आज मौन रहने को मजबूर दिखायी देते हैं। यह शोध पत्र समाज और परिवार के बदलते ताने-बाने को वरिष्ठ साहित्यकार बल्लभ डोभाल के कथा साहित्य के आलोक में वृद्धों की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो ग्रामीण और शहरी परिवेश के साथ-साथ विविध पारिवारिक ढाँचों में उनकी भूमिका और चुनौतियों को दृष्टिगत करता दिखाई देता है। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/12/28 |
| How to Cite | कोमल (2025). बल्लभ डोभाल की कहानियों में वृद्ध जीवन की अभिव्यक्ति. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 141–146. |
| License |
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