| Article Title |
दलित आलोचना का स्वरूप और विविध प्रतिमान |
| Author(s) | भगवान साहु. |
| Country | India |
| Abstract | हिंदी दलित आलोचना हिंदी साहित्य की एक सशक्त धारा है जिसने परंपरागत आलोचनात्मक सौंदर्यबोध और मानदंडों को चुनौती देकर नए साहित्यिक प्रतिमानों का निर्माण किया है। दलित आलोचना के स्वरूप में दलित लेखकों के अनुभव और सामाजिक न्याय की आकांक्षा केंद्र में है। यही कारण है कि आलोचना में जो प्रतिमान उभर कर सामने आए हैं वह समाजपरक और परिवर्तनकारी है। इसकी मुख्य विशेषताओं में दलित केंद्रित परिप्रेक्ष्य और सामाजिक प्रतिबद्धता है। साहित्य में दलित दृष्टि की सार्थकता को समझने के लिए दलित आलोचना के विभिन्न प्रतिमानों की परख आवश्यक है। दलित साहित्य के अपने सौंदर्य बोध है और यह सौंदर्य बोध पारंपरिक प्रतिमानों से भिन्न दलितों की सोच और व्यवहार से जुड़ा हुआ है। दलित आलोचक इसे इतिहास लेखन की वर्चस्वशाली परंपरा मानते हुए इसे चुनौती देते हैं और संपूर्ण परंपराओं और विरासत का पुनर्मूल्यांकन चाहते हैं। इस क्रम में साहित्य में दलित चेतना के बीज और उसके स्वर की पड़ताल वे स्वयं के मानदंडों, प्रतिमानों और सौंदर्य बोध के आधार पर चाहते हैं। दलित आलोचना की इस परिवर्तनकामी आकांक्षा ने एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। इससे साहित्य के मूल्यांकन का एक नया सौंदर्य शास्त्र विकसित हुआ है। प्रस्तुत शोध आलेख में दलित आलोचना के स्वरूप एवं उसके विविध प्रतिमानों की गहन एवं गवेषणात्मक पड़ताल प्रस्तुत की गई है। |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/07 |
| How to Cite | साहु, भगवान. (2026). दलित आलोचना का स्वरूप और विविध प्रतिमान. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 55-61. |
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