| Article Title |
‘उत्कोच’ उपन्यास में प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक चेतना |
| Author(s) | डॉ. रेखा कुर्रे. |
| Country | India |
| Abstract | प्रस्तुत शोध जयप्रकाश कर्दम द्वारा रचित उपन्यास ‘उत्कोच’(2019) के माध्यम से समकालीन भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों और उसके बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण करता है। भ्रष्टाचार आज केवल एक प्रशासनिक व्याधि न रहकर भारतीय जीवन-शैली का एक अनिवार्य और विडंबनापूर्ण अंग बन चुका है। समाज में जहाँ एक ओर सार्वजनिक मंचों पर भ्रष्टाचार का विरोध होता है, वहीं व्यक्तिगत स्तर पर इसे 'व्यावहारिक तर्क' के आधार पर स्वीकार्यता प्राप्त है। उपन्यास का नायक 'मनोहर' इस भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध एक नैतिक प्रतिरोध के रूप में उभरता है, किंतु उसकी यह सैद्धांतिक और व्यावहारिक ईमानदारी उसे सामाजिक निर्वासन की ओर धकेल देती है। लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि एक आदर्शवादी व्यक्ति को न केवल कार्यस्थल (दफ्तर) में सवर्ण सहकर्मियों के जातिगत द्वेष, उपहास और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, बल्कि उसके निजी और पारिवारिक संबंध भी इस संघर्ष की भेंट चढ़ जाते हैं। आर्थिक विपन्नता और व्यवस्थागत क्रूरता का चरम तब परिलक्षित होता है, जब उचित उपचार के अभाव में मनोहर की पत्नी की मृत्यु हो जाती है। यह उपन्यास केवल भ्रष्टाचार की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आरक्षण के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह, जाति-व्यवस्था की गहरी पैठ और दफ्तरी राजनीति में व्याप्त भेदभाव को भी पूरी गहराई से उजागर करता है। निष्कर्षतः, जयप्रकाश कर्दम ‘उत्कोच’ के माध्यम से एक ऐसे यथार्थ का चित्रण करते हैं जहाँ ईमानदारी की कीमत व्यक्तिगत क्षति और सामाजिक अलगाव के रूप में चुकानी पड़ती है। |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/25 |
| How to Cite | कुर्रे, रेखा. (2026). ‘उत्कोच’ उपन्यास में प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक चेतना. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 98-102. |
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