Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 2 (April - June 2026)
Article Title

गीता में आहारों का त्रिविध भेद तथा उनके जीवन पर प्रभाव

Author(s) प्रो. हीरालाल शर्मा, डॉ. रमेश मालाकार.
Country India
Abstract

यह लेख भगवद्गीता में वर्णित आहार के त्रिविध भेद- सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा उनके मनुष्य जीवन पर प्रभाव का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत करता है। लेख में बताया गया है कि आहार केवल शरीर के पोषण का साधन नहीं, अपितु मन, बुद्धि, स्वभाव और आचरण को भी प्रभावित करता है। “जैसा अन्न, वैसा मन” के सिद्धांत के आधार पर गीता में भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सात्त्विक आहार में फल, सब्जियाँ, दूध, घी आदि शुद्ध एवं पौष्टिक पदार्थ आते हैं, जो आयु, बल, स्वास्थ्य, शांति और सद्विचारों को बढ़ाते हैं। ऐसा भोजन व्यक्ति को संयमी, शांत और आध्यात्मिक बनाता है। राजसिक आहार अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन और गरम होता है, जो मन में चंचलता, उत्तेजना, चिंता और रोग उत्पन्न करता है। तामसिक आहार में बासी, अशुद्ध और रसहीन भोजन शामिल है, जो आलस्य, अज्ञान और दूषित प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है। लेख में यह निष्कर्ष बताया गया है कि मनुष्य के स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सात्त्विक आहार अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में तामसिक भोजन की बढ़ती प्रवृत्ति समाज और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक मानी गई है। इसलिए गीता के अनुसार शुद्ध, संतुलित और सात्त्विक आहार अपनाना मानव कल्याण के लिए अनिवार्य बताया गया है।

Area संस्कृत
Issue Volume 3, Issue 2 (April - June 2026)
Published 2026/06/10
How to Cite हीरालाल शर्मा एवं रमेश मालाकार (2026). गीता में आहारों का त्रिविध भेद तथा उनके जीवन पर प्रभाव. Shodh Sangam Patrika, 3(2), 54–58.

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