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Author(s):
नेहा चौबे.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-6 |
धूमिल के काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोण
Abstract
शोध सार - समकालीन कविता में धूमिल मील के पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित हुए है। इनके बिना समकालीन कविता की मुकम्मल तस्वीर बनती दिखाई नहीं देती। धूमिल की कविताओं में आम जनता, किसान, मजदूर, श्रमिक और उपेक्षित लोग जिनका निर्ममता से शोषण किया जा रहा हैं, उनके प्रति अपनी आवाज को निर्भयता और दृढ़ता से उठाने का प्रयास किया है। धूमिल ने सर्वहारा वर्ग के प्रति मानवीय संवेदना तथा सदियों से हो रहे शोषण को अपनी कविताओं का विषय बनाया हैं। वह शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति के साथ अपनी वेदना को वाणी देने का प्रयास किया हैं। जनशक्ति को बढ़ाने के लिए अपनी कविता को आधार बनाया हैं। शोषित वर्ग, पूंजीवादी तथा सत्ताधारी वर्ग का विरोध किया हैं। हिंसा का विरोध करते हुए अहिंसा को मानवतावाद से सफलतापूर्वक जोड़ने की कोशिश करना चाहते हैं। इनकी कविता आम जनता को मानवीय मूल्यों की गहराई तक पहुंचती हैं और उन्हें स्थापित भी करती हैं। इनकी कविता समाज,व्यवस्था तंत्र और राजनीतिक पृष्ठभूमि को उजागर करती है। उनकी कविता आम आदमी के अनुभव को महसूस करती हैं, और उस परिस्थितियों की ज्वाला को आत्मसात भी करती हैं। वह समस्त जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त अपनी कविताओं के माध्यम किया हैं। उनकी कृति भारतीय जनतंत्र में स्वतंत्रता, न्यायपूर्णता,समानता, बंधुत्वता और धर्मनिरपेक्षता को काफी महत्व देने का प्रयास करती है। मूलरूप से स्वतंत्रता के पश्चात् समाज में पूंजिवादी व्यवस्था का विकास तथा जनसाधारण का शोषण के विरुद्ध की वाणी इस दौर के कविताओं में प्रकाशित होती हैं। उनकी कविताओं के माध्यम से जनता के आशा की अभिव्यक्ति को स्पष्ट रूप से पाठक तक पहुंचाया जा सकता हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि समकालीन कवियों की दृष्टि काफी व्यापक और सजग हैं। इनकी वैचारिक दृष्टि और भाषा सरल होने के बावजूद भी पाठक के हृदय स्थल को उद्वेलित करती है। धूमिल प्रगतिशील लेखन सम्मेलन से जुड़े थे तथा सभी जगह अपनी संलग्नता और तीक्ष्णता का परिचय दिया हैं। समकालीन हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, अरुण कमल, चंद्रकांत देवताले और राजेश जोशी का प्रमुख स्थान हैं। इन कवियों में मोहभंग, जनतंत्र, शोषण और आक्रोश के दौर में व्यवस्था के विरुद्ध आम आदमी की पीड़ा और यथार्थवादी भाव को व्यक्त किया हैं।
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Author(s):
डॉ. पुष्प लता कुमारी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
7-11 |
रेहन पर रग्घू में ग्रामीण एवं आधुनिक परिवेश के बीच बनते-बिगड़ते रिश्ते
Abstract
काशीनाथ सिंह द्वारा रचित ‘रेहन पर रग्घू' अपने समय की उत्कृष्ट कृति है। यह अत्यंत गंभीर विषय एवं बदलते सामाजिक मूल्य पर आधारित उपन्यास है। आज के संदर्भ में यह उपन्यास अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह ‘व्यक्ति के अकेलेपन‘ को चरितार्थ करती है। परिस्थितिवश गाँव एवं शहर में परिवारों के दो अलग-अलग स्थानों पर रहने से आपसी समन्वय की कमी देखने को मिलती है। समयाभाव, व्यस्तता, आधुनिक जीवन की लालसा, इच्छाशक्ति में कमी एवं बात-व्यवहार के कारण व्यक्ति परिवार से दूर हो अकेलेपन का शिकार हो जाता है। उपन्यासकार ने रघुनाथ के माध्यम से उसके अकेलेपन एवं संघर्ष को दर्शाने का प्रयास किया है। परिस्थितिवश अपने भरे-पूरे परिवार जिसमें पत्नी, दो बेटे और एक बेटी होने के बावजूद भी रघुनाथ को बुर्जुगावस्था में अकेले जीवन जीने को विवश होना पड़ता है। जिस उम्र में व्यक्ति को अपने परिवार के साथ और सहयोग की आवश्यकता होती है, उस उम्र में व्यक्ति का अकेले जीवन व्यतीत करना बङा कष्टकारक होता है। ‘व्यक्ति का अकेलापन‘ आज के समाज के लिए अत्यंत सोचनीय, गंभीर एवं खतरनाक अवस्था है क्योंकि आज नयी पीढी इसी ढर्रे पर चल रही है। आज व्यक्ति को अपने बुर्जुगों से सम्मान, प्यार अपनापन और साझेदारी बना कर रखना चाहिए जिससे उनका जीवन आसानी से कट सके। काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास में विविध पात्रों के माध्यम से आधुनिक जीवन की इस विङम्बना का विस्तृत विवेचन किया है।
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Author(s):
अमर बहादुर.
Country:
India
Research Area:
दर्शनशास्त्र
Page No:
12-19 |
महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन: सिद्धांत और व्यवहारिकता का विश्लेषण
Abstract
यह शोध पत्र महात्मा गांधी के शिक्षा दर्शन के सिद्धांतों एवं उसकी व्यवहारिकता का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधीजी ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का साधन न मानकर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम माना है, जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों आयामों का संतुलित विकास शामिल है। उनके शिक्षा दर्शन का प्रमुख आधार ‘नई तालीम’ है, जो कार्य-आधारित शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा नैतिक मूल्यों पर आधारित है। इस अध्ययन में गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों जैसे—सत्य, अहिंसा, श्रम की गरिमा, मातृभाषा में शिक्षा तथा चरित्र निर्माण—का विश्लेषण किया गया है। शोध में गुणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों, जैसे पुस्तकों, शोध पत्रों एवं सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि गांधीवादी शिक्षा सिद्धांत व्यवहार में किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गांधीजी का शिक्षा दर्शन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर वर्तमान समय में जब शिक्षा अधिकतर परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 में भी गांधीवादी शिक्षा के तत्व, जैसे कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम तथा मूल्य-आधारित शिक्षा, स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। हालांकि, आधुनिक तकनीकी युग में गांधीवादी शिक्षा के पूर्ण कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे संसाधनों की कमी, पारंपरिक शिक्षा प्रणाली का प्रभुत्व तथा तकनीकी शिक्षा के साथ संतुलन की आवश्यकता। अतः यह कहा जा सकता है कि यदि गांधीजी के शिक्षा सिद्धांतों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कर लागू किया जाए, तो यह शिक्षा प्रणाली को अधिक मानवीय, व्यावहारिक एवं प्रभावी बना सकता है।
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Author(s):
डॉ. सुमिता.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
20-25 |
चारुचंद्र चंदोला के काव्य में वर्णित मानवेत्तर चेतन जगत का सौंदर्य वर्णन
Abstract
उत्तराखंड के प्रसिद्ध साहित्यकार व पत्रकार चारुचंद्र चंदोला ने अपनी साहित्य यात्रा में अनेक काव्यों का सृजन किया तथा सभी काव्यों में आंचलिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक परिवेश को प्रमुखता से उजागर किया है। चारुचंद्र जी का बाल्यकाल पर्वतीय परिवेश में व्यतीत होने के कारण उनके मानस व हृदय पर पहाड़ के प्रतिबिंब की झलक स्पष्टतः दृष्टिगत होती है।
सौंदर्य के मानवीय व प्राकृतिक अनेक पक्षों का चारु जी ने अत्यंत सूक्ष्मता से विवेचन किया है। समय व परिस्थितियों का वास्तविक अंकन पर आधारित सौंदर्य चारु जी ने निरूपित किया है।
कवि अपने विचारों को अत्यंत स्पष्टता, बेबाकी व कटाक्ष के साथ-साथ व्यंग्यात्मक रूप से व्यक्त करते थे।
प्रस्तुत शोध पत्र में चारुचंद्र चंदोला के काव्य में वर्णित मानवेत्तर चेतन जगत के सौंदर्य पर प्रकाश डाला गया है।
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Author(s):
संदीप कौर.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
26-31 |
मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ में नारी अस्मिता और आत्मसंघर्ष
Abstract
मेरे शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ में नारी संवेदना की अभिव्यक्ति को समझना है। मृदुला गर्ग एक शांत, संकोची तथा अंतर्मुखी स्वभाव की लेखिका हैं। उनका उपन्यास ‘कठगुलाब’ नारी भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाली एक सशक्त कृति है, जिसमें स्त्री पर होने वाले अन्याय, अत्याचार और उसकी पीड़ा के साथ-साथ स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता को अत्यंत संवेदनशील रूप में चित्रित किया गया है। ‘कठगुलाब’ का प्रतीकात्मक अर्थ “नारी की जिजीविषा” है। लेखिका का मानना है कि स्त्रियाँ साधारण गुलाब की तरह नहीं होतीं, जो स्वतः ही खिल उठें, बल्कि वे कठगुलाब की भाँति होती हैं, जिन्हें खिलने के लिए विशेष देखभाल और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है।
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Author(s):
विजय पाल.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
32-36 |
हरियाणा के लोक नाट्य सांग में अभिनय की सहज़ता और माईज़नर अभिनय तकनीक:तुलनात्मक अध्ययन
Abstract
लोक नाट्य सांग हरियाणा के लोक जीवन की परंपराओं का अहम हिस्सा है। सांग के अभिनेता को सांगी कहा जाता है। सांगी गायन, संवाद और शारीरिक गतियों द्वारा लोक जीवन के कथानकों का कलात्मक प्रदर्शन करता है। साँगों का ताना-बाना विविन्न प्रकार के लोक गीतों से उपज़े कला-तन्तुओं से बुना हुआ है। साँग में यह रागिनी का जादू ही है, जो सिर चढ़कर बोलता है। एक हाथ कान पर रखकर और दूसरे को आकाश में उठाकर अभिनेता जब एक विशेष अन्दाज़ में अपनी रागिनी गाता है, तो समां बँध जाता है। सांगी अक्सर दर्शकों से जुड़ने के लिए हास्य व्यंग्य, गीत और अतिशयोक्तिपूर्ण हाव-भाव का उपयोग करता है, चुंकि सांगी क्षेत्र के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने बाने में रमा होता है इसलिये इसके अभिनय में सहज़ गतिशीलता और तालमेल दिखाई देता है। यह सहज़ गतिशीलता और तालमेल दर्शक को भावनात्मक रूप से प्रदर्शन के साथ जोड़ देती है। वहीं दुसरी तरफ माईज़नर अभिनय तकनीक अभिनेता को पल में रखते हुए सच्ची भावनाओं को जीना सिखाती है। यह तकनीक अमेरिकी अभिनय प्रशिक्षक सेन्फोर्ड माईज़नर द्वारा विकसित की गई है इसका उदैश्य अभिनेता को सहज़ बनाना है ताकि अभिनेता दृश्य में दि गई काल्पनिक परिस्थितियों में सत्यता से व्यवहार कर सके जिससे दृश्य जीवन का हिस्सा लगे। यह तकनीक सैन्फोर्ड माईज़नर द्वारा लम्बे समय तक दिये गये अभिनय प्रशिक्षण के अनुभवों पर आधारित है। यह शोध पत्र उत्तर भारत में स्थित हरियाणा के लोक नाट्य सांग में अभिनय की सहज़ता और माईज़नर अभिनय तकनीक द्वारा अभिनेता को सहज़ बनाने की प्रक्रिया का तुलनात्मक अध्ययन है।
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Author(s):
डॉ. ममता ध्यानी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
37-41 |
संत काव्यधारा में ‘विपश्यना’
Abstract
हिंदी साहित्य में मुख्य रूप से भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा को संत काव्यधारा की संज्ञा दी जाती है। इसके अंतर्गत संतों की एक लंबी परंपरा है जो भक्तिकाल से लेकर मध्ययुग उत्तरार्ध तक दिखाई देती है। ‘विपश्यना’(संस्कृत) या ‘विपस्सना’(पालि) सिद्धार्थ गौतम जो बाद में बुद्ध हुए के द्वारा अविष्कृत ध्यान की एक शुद्ध वैज्ञानिक पद्धति है जिसके द्वारा उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त किया। इसका अर्थ है-विशेष प्रकार से देखना (वि+पश्य+ना)। भारत की यह प्राचीन विद्या बुद्ध के बाद एक लंबे समय तक भारत में रही और फिर अपने शुद्ध रूप में लुप्त हो गई। कुछ अन्य पड़ोसी देशों में बहुत कम लोगों ने गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा इस विद्या को इसके शुद्धतम रूप में जीवित रखा। भारत में 70 के दशक में श्री सत्यनारायण गोयनका(पद्मभूषण) द्वारा इस साधना पद्धति को पुनः स्थापित किया गया। आज अपने व्यावहारिक रूप में भारत और विश्व के अन्य देशों में इस साधना पद्धति को सैकड़ों केंद्रों में सिखाया जाता है। संत काव्यधारा के संतों ने अनुभूति पक्ष पर विशेष बल दिया है जो विपश्यना विद्या का मूल है और गहराई से देखने पर इस काव्याधरा के संतों की वाणी में सर्वत्र विपश्यना दिखाई देती है।
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Author(s):
अनूपा.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
42-45 |
रस्किन बॉन्ड के हिन्दी अनूदित कथा साहित्य में भारतीय नारी
Abstract
रस्किन बॉन्ड का कथा साहित्य भारतीय जीवन, प्रकृति और मानवीय सम्बन्धों का गहन और संवेदनशील चित्रण करता है उनके हिन्दी अनूदित लेखन में भारतीय नारी के विभिन्न पहलुओं जैसे ममता, त्याग, स्वतन्वता संघर्ष, नैतिकता और अंतर्द्वंद को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य रस्किन बॉन्ड की हिंदी अनूदित रचनाओं के माध्यम से भारतीय नारी के इन बहुआयामी रुपों का गहन विश्लेषण करना है। अध्ययन में विशेष रूप से,नीली छतरी,रस्टी के कारनामे, रस्किन बॉन्ड की लोकप्रिय कहानियां, और महारानी, जैसी रचनाओं का चयन किया गया है।
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Author(s):
डॉ. मदन लाल.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
46-53 |
समकालीन हिंदी नवगीत : शहरी जीवन का यथार्थ प्रतिबिम्ब
Abstract
नवगीत समकालीन अनुभूतियों का क्रमबद्ध उद्रेक है। यह वर्तमान हिन्दी साहित्य को अपने नूतन कलेवर में अनुभूति एवं लययुक्त होकर स्पंदित कर रहा है। यह अपने जन्म से ही समकालीन होने का गौरव लिए है। नवगीत के नवीन कथ्य में शहरी जीवन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यथार्थ नगरीय जीवन अपने जीवनकाल में जिन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का सामना किस भाँति करता है; वह नवगीत का कथ्य है। शहरी जीवन का वातावरण, भाग-दौड़, संघर्ष, उपभोक्तावादी मानसिकता, बाजारवाद, अपसंस्कृति, अलगाव, यांत्रिकता, कुंठा, घुटन, थकन, उलझन एवं अपने अस्तित्व के लिए प्रयास जीवन को बोझिल बना देते है। नवगीत अपनी यात्रा में इन्हें सहयात्री बनाकर चल रहा है। यह नगरीय जीवन के हर उस हृदय में झाँककर अभिव्यक्त हुआ है जिसने बिना किसी आनाकानी के इसे भीतर प्रवेश होने दिया; किंचित् हृदय समुद्रों के अनुभूति मोक्तिक लब पुलिन पर आना अभी शेष है, जिसे अतल गहराई में जाकर ही समेटना श्रेयस्कर होगा।
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Author(s):
प्रो. हीरालाल शर्मा, डॉ. रमेश मालाकार.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
54-58 |
गीता में आहारों का त्रिविध भेद तथा उनके जीवन पर प्रभाव
Abstract
यह लेख भगवद्गीता में वर्णित आहार के त्रिविध भेद- सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा उनके मनुष्य जीवन पर प्रभाव का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत करता है। लेख में बताया गया है कि आहार केवल शरीर के पोषण का साधन नहीं, अपितु मन, बुद्धि, स्वभाव और आचरण को भी प्रभावित करता है। “जैसा अन्न, वैसा मन” के सिद्धांत के आधार पर गीता में भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
सात्त्विक आहार में फल, सब्जियाँ, दूध, घी आदि शुद्ध एवं पौष्टिक पदार्थ आते हैं, जो आयु, बल, स्वास्थ्य, शांति और सद्विचारों को बढ़ाते हैं। ऐसा भोजन व्यक्ति को संयमी, शांत और आध्यात्मिक बनाता है। राजसिक आहार अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन और गरम होता है, जो मन में चंचलता, उत्तेजना, चिंता और रोग उत्पन्न करता है। तामसिक आहार में बासी, अशुद्ध और रसहीन भोजन शामिल है, जो आलस्य, अज्ञान और दूषित प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है।
लेख में यह निष्कर्ष बताया गया है कि मनुष्य के स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सात्त्विक आहार अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में तामसिक भोजन की बढ़ती प्रवृत्ति समाज और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक मानी गई है। इसलिए गीता के अनुसार शुद्ध, संतुलित और सात्त्विक आहार अपनाना मानव कल्याण के लिए अनिवार्य बताया गया है।
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Author(s):
डॉ. गौतम कुमार.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
59-67 |
भारतीय राष्ट्रवाद का उत्थान: सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण
Abstract
भारतीय राष्ट्रवाद का उदय आधुनिक भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसका निर्माण केवल राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम नहीं था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक तथा वैचारिक परिवर्तनों के सम्मिलित प्रभाव से हुआ। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज अनेक सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक विषमताओं और राजनीतिक दमन से प्रभावित था। ऐसे समय में आधुनिक शिक्षा, सामाजिक सुधार आंदोलनों, प्रेस एवं साहित्य, धार्मिक पुनर्व्याख्या तथा शिक्षित मध्यम वर्ग के उदय ने भारतीय समाज में नई चेतना का संचार किया। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद के उत्थान में सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण करना है तथा यह समझना है कि किस प्रकार इन कारकों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक और जनाधार प्रदान किया।
सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जातिगत असमानताओं, महिला उत्पीड़न, बाल विवाह, सती प्रथा तथा अस्पृश्यता जैसी समस्याओं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामाजिक पुनर्गठन का प्रयास किया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, स्वामी दयानन्द सरस्वती और नारायण गुरु जैसे सुधारकों ने सामाजिक चेतना एवं राष्ट्रीय एकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर आर्थिक कारकों में ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण, भूमि-राजस्व नीति, औद्योगिक अविकास, विदेशी पूंजी का वर्चस्व तथा दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित धन-निकासी सिद्धांत ने भारतीय जनता में आर्थिक असंतोष को बढ़ाया और राष्ट्रवादी चेतना को प्रबल किया।
यह अध्ययन ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें पुस्तकों, शोध आलेखों, अभिलेखीय दस्तावेजों तथा द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरण और आर्थिक शोषण के विरुद्ध उत्पन्न सामूहिक चेतना का परिणाम था, जिसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार और वैचारिक दिशा प्रदान की।
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Author(s):
डॉ. अतुलकुमार भीखाभाई उनागर.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
68-76 |
अनन्यता का विज्ञान : मानव सामर्थ्य एवं प्राकृतिक नियति का दार्शनिक अध्ययन
Abstract
शोध-संक्षेप (Abstract) :
इस शोधपत्र में प्राचीन चिंतन के गूढ़ और शाश्वत दार्शनिक सिद्धांतों तथा वर्तमान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच के तात्त्विक अध्ययन के पश्चात मानव-जीवन में 'अनन्यता' के विज्ञान का संपूर्ण अवलोकन और विश्लेषण किया गया है। जगत का प्रत्येक छोटा-बड़ा घटक एक सुव्यवस्थित वैश्विक-अनुशासन (ऋत) और नियतिबद्ध कार्य-कारण संबंध की श्रृंखला से सुनियोजित रूप से संचालित है। इस सार्वभौमिक नियम के अंतर्गत प्रत्येक मानव का जीवन भी एक निश्चित वैयक्तिक स्वरूप, नैसर्गिक गुण-सामर्थ्य और प्रत्येक की भिन्न-भिन्न जैविक-मानसिक सीमाओं के एक निश्चित 'प्रकृति-संपुटन' के साथ जन्म लेता है। सांख्यदर्शन के पुरुषार्थ-प्रवृत्ति नियम, भगवद्गीता के स्वधर्म-निरूपण तथा आधुनिक विभेदक मनोविज्ञान के 'वैयक्तिक भिन्नता' के सिद्धांत से यह प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य की अंतर्निहित सिद्धियां/शक्तियां तथा मर्यादाएं ही उसके वास्तविक जीवन-कार्य, योगदान तथा कार्यक्षेत्र का निर्धारण करती हैं। इस शोध का मुख्य निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि अन्यों के बाह्य अनुकरण के स्थान पर अपनी सहज प्रकृतिदत्त अनन्यता की सच्ची पहचान और आत्मबोध ही मानवीय सामर्थ्य या सफलता का मूल स्रोत है, जिसके द्वारा स्व से वैश्विक कल्याण, सार्थक जीवन और नूतन महासर्जन संभव बनता है, इस सिद्धांत को समझने वाले प्रत्येक मानवजीवन का उद्धार निश्चित ही है।
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Author(s):
डॉ. कोमल शैलेषभाई भट्ट.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
77-83 |
महाभारते वृक्षचैतन्यविमर्शः
Abstract
वृक्षे चैतन्यमस्ति इति विषयः प्राचीनकालात् विचारणीयः अस्ति। अस्मिन् शोधपत्रे वेद, उपनिषद् तथा महाभारतादि ग्रन्थानां आधारेण वृक्षचैतन्यस्य विवेचनं कृतम्। विशेषतः महाभारतस्य शान्तिपर्वणि वर्णितः भारद्वाज–भृगुसंवादः अस्य अध्ययनस्य मुख्याधारः अस्ति। तत्र वृक्षेषु चैतन्यस्य अस्तित्वं तर्कसंगतरीत्या प्रतिपादितम्।
अध्ययनस्य उद्देश्यं वृक्षेषु चेतनास्वरूपं दार्शनिकतया, शास्त्रीयतया तथा वैज्ञानिकदृष्ट्या परीक्षणम्। निष्कर्षतः प्रतिपद्यते यत् वृक्षाः केवलं जडपदार्थाः न, अपितु संवेदनशील-चेतनयुक्तजीवाः सन्ति। वृक्षे चैतन्यमस्ति तस्मिन् विषये प्रायः वयं पृच्छामः तदा तस्य संशोधकरूपेण अस्माकं भारते जगदीशचन्द्र बोझ इति नाम मुखे आगच्छति किन्तु महाभारते यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ।। तदनुसारं महाभारते सर्वज्ञानं वर्तते ।