भारतीय काव्यविद्या का स्‍वरूप एवं प्रतिपाद्य

Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 1 (January - March 2026)
Article Title

भारतीय काव्यविद्या का स्‍वरूप एवं प्रतिपाद्य

Author(s) आचार्य राहुल पन्त, डॉ. नीरज कुमार जोशी.
Country India
Abstract मानव जीवन कि सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्ति विद्या (ज्ञान) को कहा जाता है| विद्या व्यक्ति के जीवन को प्रकाशमय बनाने में सहायक सिद्ध होती है| विद्या व्यक्ति के भीतर सोचने समझने कि क्षमता विकसित करती है| विद्या व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार को संवारती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति आत्मनिर्भर और विवेकशील बनता है| येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः| ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति|| जिन मनुष्यों के पास विद्या नही है, तप जीवन में नही है, दान देने की इच्छा नही है, न ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा है, न ही उनके जीवन में सदाचार है और न ही धर्म है, इस प्रकार के मनुष्य पृथ्वी पर भारभूत मात्र हैं और मनुष्य के रूप में वे पशु के समान व्यर्थ विचरण कर रहे हैं| विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्| पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्|| विद्या से मनुष्य में विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन की प्राप्ति होती है, धन के द्वारा वह धर्म-कर्म करता है, और धर्म-कर्म से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति को रोजगार की भी प्राप्ति होती है, जिससे वह धनार्जन करके अपने जीवन का निर्वाह करता है| अतः विद्याध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है| शस्त्रविद्या एवं शास्त्रविद्या दोनों का आदर करना चाहिए| परन्तु शस्त्रविद्या बुढापे में ‘पुरुषार्थ’ न होने से काम नही आती, बल्कि उपहास कराती है| लेकिन शास्त्रविद्या सर्वदा (सब काल में) आदर प्रदान कराती है| विद्या सब काल में व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त करवाती है| विद्वान पुरुष को समाज आदर और सम्मान कि दृष्टि से देखता है|
Area संस्कृत
Issue Volume 2, Issue 4 (October - December 2025)
Published 2025/11/05
How to Cite पन्त, आचार्य राहुल, एवं जोशी, नीरज कुमार. (2025). भारतीय काव्यविद्या का स्‍वरूप एवं प्रतिपाद्य. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 28-35.

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