| Article Title |
भारतीय काव्यविद्या का स्वरूप एवं प्रतिपाद्य |
| Author(s) | आचार्य राहुल पन्त, डॉ. नीरज कुमार जोशी. |
| Country | India |
| Abstract | मानव जीवन कि सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्ति विद्या (ज्ञान) को कहा जाता है| विद्या व्यक्ति के जीवन को प्रकाशमय बनाने में सहायक सिद्ध होती है| विद्या व्यक्ति के भीतर सोचने समझने कि क्षमता विकसित करती है| विद्या व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार को संवारती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति आत्मनिर्भर और विवेकशील बनता है| येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः| ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति|| जिन मनुष्यों के पास विद्या नही है, तप जीवन में नही है, दान देने की इच्छा नही है, न ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा है, न ही उनके जीवन में सदाचार है और न ही धर्म है, इस प्रकार के मनुष्य पृथ्वी पर भारभूत मात्र हैं और मनुष्य के रूप में वे पशु के समान व्यर्थ विचरण कर रहे हैं| विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्| पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्|| विद्या से मनुष्य में विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन की प्राप्ति होती है, धन के द्वारा वह धर्म-कर्म करता है, और धर्म-कर्म से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति को रोजगार की भी प्राप्ति होती है, जिससे वह धनार्जन करके अपने जीवन का निर्वाह करता है| अतः विद्याध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है| शस्त्रविद्या एवं शास्त्रविद्या दोनों का आदर करना चाहिए| परन्तु शस्त्रविद्या बुढापे में ‘पुरुषार्थ’ न होने से काम नही आती, बल्कि उपहास कराती है| लेकिन शास्त्रविद्या सर्वदा (सब काल में) आदर प्रदान कराती है| विद्या सब काल में व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त करवाती है| विद्वान पुरुष को समाज आदर और सम्मान कि दृष्टि से देखता है| |
| Area | संस्कृत |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/11/05 |
| How to Cite | पन्त, आचार्य राहुल, एवं जोशी, नीरज कुमार. (2025). भारतीय काव्यविद्या का स्वरूप एवं प्रतिपाद्य. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 28-35. |
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