| Paper Title | संत नितानंद के काव्य में औदात्त्य की अभिव्यंजना |
| Author(s) | प्रो. सुकर्मवती देवी. |
| Country | India |
| Abstract | संत नितानंद जी ने अपनी वाणी ‘सत्य- सिद्धांत- प्रकाश’ के माध्यम से संत साहित्य व समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। उनका सम्पूर्ण साहित्य मानव - मूल्यों पर केंद्रित है। उनकी वाणी मानव - प्रेम से लेकर ईश- प्रेम तक सामाजिक जीवन के उदात्त विचारों के समृद्ध भंडार को संजोए हुए है। तत्कालीन समय में वर्ग वैषम्य और जातिभेद अपनी सीमा पार कर रहे थे। उन्होंने एक सजग प्रहरी की तरह वर्णाश्रम व्यवस्था, जातिगत संकीर्णता, सांप्रदायिक भेदभाव, मूर्तिपूजा, बाह्याडम्बरों,पाखंडों व विषय - विकारों आदि पर जमकर प्रहार करते हुए अंत:करण की शुद्धता पर बल दिया। परम तोष परमात्मा के प्रति प्रणय- भाव की अनुभूति के साथ उन्होंने अनेक रहस्यानुभूतियों की अभिव्यंजना की है। बह्म, जीव, जगत व माया के प्रति उन्होंने जिन दार्शनिक विचारों को अभिव्यक्त किया है, वे अत्यंत उदात्त एवं उत्कृष्ट हैं। इन्होंने दर्शन, धर्म एवं समाज में व्याप्त कुरीतियों का खंडन कर लोगों को सत्कर्म करने के लिए प्रेरित किया जो तत्कालीन समाज के लिए महान संदेश था और आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उनके काव्य में सत्य, अहिंसा, करूणा, समानता व स्वतंत्रता आदि शाश्वत मूल्यों की स्थापना की गई है जो सामाजिक जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। आचार और विचार के शील, क्षमा, सहिष्णुता निर्वैर आदि भावों की गहन व्याख्या करने में उनकी वाणी बेजोड़ है। उनके काव्य में विचार, भाव एवं शैली सभी दृष्टियों से औदात्त्य का मणिकांचन संयोग हुआ है। मुख्य शब्द : उदात्त, मानव-मूल्य, दार्शनिक, भेदभाव, रहस्यानुभूति, संकीर्णता। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/12/05 |
| How to Cite | सुकर्मवती देवी (2025). संत नितानंद के काव्य में औदात्त्य की अभिव्यंजना. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 66–72. |
| License |
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