| Article Title |
संजीव के उपन्यासों में प्रगतिशील चेतना एवं प्रतिरोध का स्वर |
| Author(s) | लक्ष्मीन चौहान, डॉ. (श्रीमती) श्रद्धा चंद्राकार. |
| Country | India |
| Abstract | हिन्दी साहित्य जगत में समकालीन दौर के बहुप्रतिष्ठित साहित्यकार संजीव का स्थान अग्रणीय एवं अतुलनीय है | सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों तथा समस्याओं को लेकर लेखनी चलाने वाले प्रगतिशील विचारधारा से संबन्धित साहित्यकारों मे संजीव का स्थान अन्यतम है | ग्रामीण तथा शहरी समाज में घटित घटनाओं तथा शोषण का वर्णन इनकी उपन्यासों में बखूबी दर्शाया गया है | पीड़ित, दलित, शोषित, उपेक्षित पात्रों का वर्णन कथावस्तु तथा परिवेश के आधार पर जीवंत रूप में पाठक वर्ग के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है | इनके रचनाओं की महत्वपूर्ण विशेषता रही है, शोधपरख रचनाशीलता | इनकी रचनाओं में प्रगतिवाद का स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है | सामंतवाद, जातिवाद, आदिवासियों का विस्थापन, नारियों का शोषण इत्यादि समस्याओं का यथार्थ वर्णन इनकी उपन्यासों में देखा जा सकता है| तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक मुद्दों व समस्याओं का सजीव वर्णन एवं पात्रों द्वारा प्रतिरोध का स्वर इनकी 'अहेर', 'धार', 'जंगल जहाँ शुरू होता है', 'सूत्रधार', 'पाँव तले की दूब', 'फाँस' इत्यादि उपन्यासों में मुखर रूप से देखा जा सकता है| सामाजिक शोषण तंत्र में व्याप्त भरष्टाचार और कूटनीतियों का तत्कालीन परिवेश में जो वर्णन किया गया है, वह आज के दौर में भी प्र्सांगिक है| निम्नवर्गीय समाज में व्याप्त, जातिवादी मानसिकता व धार्मिक बाह्य आडंबरों को बड़ी ही संजीदगी व बारीकी से इनकी कृतियों में पेश किया गया है| |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/07 |
| How to Cite | चौहान, लक्ष्मीन, एवं चंद्राकार, (श्रीमती) श्रद्धा. (2026). संजीव के उपन्यासों में प्रगतिशील चेतना एवं प्रतिरोध का स्वर. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 62-66. |
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