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Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Papers - Volume 3, Issue 3 (July - September 2026)
Paper Title

अवतारवाद और कर्मचक्र

Author(s)प्रो. अर्चना दुबे.
CountryIndia
Abstract

संसार के अलग- अलग धर्मों में अवतारवाद अत्यंत आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी अवतार मान्य हैं विशेष रूप से भारतवर्ष में हिंदू धर्म में अवतारवाद की विशेष प्रतिष्ठा है जैसाकि हिंदू धर्म में माना जाता है कि धर्म के स्थान पर अधर्म की प्रबलता होने पर भगवान का अवतार होता है सज्जनों के उद्धार और दुर्जनों के विनाश, अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान के अवतार धारण करने का प्रयोजन गीता के इस श्लोक में स्पष्ट होता है- परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।। वैष्णव धर्म में अवतार का तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। कर्मचक्र की बात करें तो विष्णु के दशावतारों में दाशरथि राम और श्रीकृष्ण के अवतार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक ने कर्मचक्र को सिद्ध किया जिसका उल्लेख रामायण की उस कहानी में प्राप्त होता है जिसमें राजा दशरथ के बाण से श्रवण कुमार की मृत्यु होने पर श्रवण कुमार के माता-पिता के राजा दशरथ को दिए गए पुत्र वियोग के श्राप से श्री राम को वनवास मिला द्वितीय ने कर्म की मीमांसा कर कर्म का उपदेश दिया- युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।। अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।। दाशरथि राम अवतार होकर भी लोक के अधिक निकट हैं। उनका अपने युग में अवतार लेना लोक हित के प्रयोजन से ही था। त्रेता युग में जब राक्षस जाति के अत्याचारों से साधु-संत त्रस्त थे समस्त पृथ्वी आतंकित होकर काँप रही थी असत प्रवृत्तियों का भण्डार रावण और उसकी सेना अत्याचार एवं प्रजापीड़न करती है ऐसे में राम उच्चतम आदर्श के प्रतीक बन एक ओर अनाचारी, अत्याचारी राक्षस जाति का नाश करते हैं तो दूसरी ओर लोक के समक्ष धैर्य,शील, साहस, मर्यादा, त्याग, सत्य, न्याय, कर्तव्य पालन और समता का आदर्श भी स्थापित करते हैं। मानवता का पोषण करते हुए परब्रह्म होकर भी वे मानव अधिक हैं, मानव को धैर्यपूर्वक सुख-दुख के प्रति समान भाव रखते हुए जीवन यापन का मार्ग अपनाने के हेतु से वे स्वयं ऐसा जीवन धारण करते हैं जिसमें दु:ख हैं वियोग है, कठिनाइयाँ हैं, निराशा है, आँसू हैं, संघर्ष हैं, ताप (दैहिक दैविक भौतिक) हैं और इन तापों का विनाश करके एक समृद्धशाली, सर्वसुख सम्पन्न, सर्वजनोपयोगी, भयविहीन आदर्श “रामराज्य” की स्थापना का संकल्प भी है। वे अपने जीवन के माध्यम से कर्म योग की प्रेरणा देते हैं। साक्षात नारायण जिनके बारे में शिवजी कहते हैं- केहि बिधि दरसन होइ गुप्तरुप अवतरेउ प्रभु गए जान सब कोइ।। ऐसे नारायण के अवतार दाशरथि राम के जीवन को जानकर कर्मचक्र और अवतार के सहसंबंध को जाना जा सकता है। कर्मचक्र का सिद्धान्त यह बताता है कि हमारे कर्म हमारे वर्तमान जीवन और भावी जीवन के अनुभवों का निर्धारण करते हैं, कर्म चक्र में क्योंकि क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम कार्य करता है और हमारे द्वारा किए गए हर कार्य का एक परिणाम होता है जो हमारे अगले जीवन या अगले अनुभव को प्रभावित करते हैं। राम का अवतरण दानवों के विनाशार्थ एवं सज्जनों के पालनार्थ हुआ – तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।। राम का जन्म असत् पर सत् की विजय और मानवता की रक्षा के द्वारा मानव जाति में इस अनुभव को स्थापित करता है कि बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित है किन्तु ‘राम’ के ‘राम’ बनने में गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करना, शिक्षा के समस्त कौशल प्राप्त करना जिससे दैत्यों का नाश कर प्रजा की रक्षा कर सकें, पिता के वचन से राज्य को त्यागकर तपस्वी का वेश धारण करके भीषण वन में चले जाना इस अनुभव को जीवन में लाता है कि पिता का स्थान सर्वोपरि है, उनके वचन का निर्वाह करना पुत्र का धर्म है इस धर्म का परिणाम है- दैत्यों का नाश। यदि राम वन नहीं जाते तो रावण (अधर्म) का संहार नहीं होता – पिता बचन तजि राज उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।

Subject Areaहिन्दी साहित्य
Issue Volume 2, Issue 4 (October - December 2025)
Published2025/11/05
How to Cite अर्चना दुबे (2025). अवतारवाद और कर्मचक्र. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 1–8.
License
Copyright © 2025 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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