| Paper Title | हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबंधों में लोकतांत्रिक मूल्य |
| Author(s) | शुभम थपलियाल. |
| Country | India |
| Abstract | हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य साहित्य के तीक्ष्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया। यह शोध-पत्र उनके निबंधों में लोकतंत्र के मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता, न्याय, सहभागिता, जवाबदेही, पारदर्शिता, धर्मनिरपेक्षता एवं विधि का शासन—का विश्लेषण करता है। परसाई का व्यंग्य मार्क्सवादी प्रभावित होते हुए भी विचारधाराओं से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार, शोषण और असमानता पर प्रहार करता है। उनका लेखन नकारात्मक नहीं, अपितु सुधारवादी है; विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, यह विद्रूपताओं से जूझकर सकारात्मकता अर्जित करता है। ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ में समानता की विडंबना ठंड में ठिठुरते गणतंत्र के रूप में उभरती है। ‘सड़े आलू का विद्रोह’ स्वतंत्रता को खोखले बुद्धिजीवियों की निष्क्रियता दिखाता है। न्याय ‘पांडवों की अख्यायिका’ में धन के आगे सत्य की हार बनता है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ सहभागिता की जगह अविश्वास को चित्रित करता है। ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ जवाबदेही की कमी को भ्रष्ट पुलिस तंत्र से जोड़ता है। ‘खेती’ में पारदर्शिता कागजी योजनाओं में दबकर रह जाती है। ‘खुदा से लड़ाई की सज़ा’ धर्मनिरपेक्षता पर धर्म-राजनीति के मिश्रण का खतरा उजागर करता है। ‘भ्रष्टाचार नियोजन आंदोलन’ विधि के शासन को रिश्वतखोर व्यवस्था में बदलता दिखाता है। परसाई व्यंग्य को सामाजिक कर्म मानते थे, जो हास्य-करुणा से समाज को आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है। उनका लेखन नेहरू युग से इमरजेंसी तक के संदर्भों में लोकतंत्र के अंतर्विरोधों को आईना दिखाता है। निष्कर्षतः, परसाई सतर्कता और सक्रियता की माँग करते हैं, ताकि लोकतंत्र आदर्श से यथार्थ बने। उनका योगदान आज भी प्रासंगिक है। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/11/11 |
| How to Cite | शुभम थपलियाल (2025). हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबंधों में लोकतांत्रिक मूल्य. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 36–41. |
| License |
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