| Paper Title | ऋतुराज के काव्य में स्त्री की सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्रण |
| Author(s) | नरेन्द्र कुमार, निरुपमा हर्षवर्धन. |
| Country | India |
| Abstract | समकालीन हिंदी कविता समाज के बदलते परिवेश और जीवन-संघर्षों का सशक्त दर्पण है। विशेषतः जनवादी कविता ने साहित्य को जनजीवन के ठोस यथार्थ से जोड़ते हुए समाज के उपेक्षित, दलित, श्रमिक तथा स्त्री वर्ग की वास्तविक परिस्थितियों को केंद्र में रखा है। जनवादी कवियों का मानना रहा है कि कविता का उद्देश्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाना है। इसी दृष्टि से उन्होंने स्त्री के अदृश्य श्रम, दोहरे शोषण और उसके संघर्षशील अस्तित्व को आवाज़ दी है।जनवादी कविता स्त्री को किसी देवी, प्रतीक या करुणा-मूर्ति के रूप में नहीं देखती, बल्कि एक जीवित, संघर्षरत, श्रमशील और चेतन मानव के रूप में प्रस्तुत करती है। समकालीन स्त्री जहाँ आर्थिक शोषण और पितृसत्ता के दबावों से जूझती है, वहीं अपनी अस्मिता, श्रम और आत्मबल के आधार पर प्रतिरोध भी करती है।इसी परंपरा में ऋतुराज की कविताएँ जनवादी चेतना का महत्वपूर्ण स्वर हैं। वे स्त्री को जीवन के कठोर यथार्थ के बीच भी हँसते, संघर्ष करते और श्रम से सुगंधित जीवन रचते देखते हैं। उनकी “गरीब स्त्री”, “कन्यादान”, “मास्टरनी”, “माँ का दूध” जैसी कविताएँ स्त्री के भीतर दबे दर्द, श्रम, संवेदना और जिजीविषा को अत्यंत गहनता से व्यक्त करती हैं। ऋतुराज की काव्य दृष्टि में स्त्री कोई मिथकीय छवि नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली सृजनशील शक्ति है।इस प्रकार समकालीन जनवादी कविता स्त्री के वास्तविक जीवन-संघर्षों को उजागर कर समाज के लिए चेतना का दस्तावेज़ बनती है। यह बताती है कि स्त्री की अस्मिता, स्वाधीनता और गरिमा के बिना जनवाद अपूर्ण है। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/11/28 |
| How to Cite | नरेन्द्र कुमार एवं निरुपमा हर्षवर्धन (2025). ऋतुराज के काव्य में स्त्री की सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्रण. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 56–61. |
| License |
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