| Article Title |
संगीत की उपशास्त्रीय विधाओं का अवलोकन |
| Author(s) | डॉ. प्रियंका कुमारी. |
| Country | India |
| Abstract | वैदिक काल से ही भारतीय संगीत की अपनी एक अलग पहचान रही है, जो जनसाधारण को मनोरंजित करता रहा है। यह संगीत अपने-अपने क्षेत्रों में अलग-अलग भाषा लिए होने के अलावा अनेकता में एकता लिए हुए है। समय-समय पर एक-दूसरे स्थानों में इसका प्रचार-प्रसार होता रहा है, जिसमें आज सुलभता के कारण दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट आदि का प्रमुख स्थान है। पंडित शारंगदेव ने गायन, वादन एवं नृत्य की त्रिवेणी को संगीत कहा है, जिसमें गान्धर्व कलाओं में गान को सर्वप्रथम स्थान दिया गया है। संगीत में वाद्ययंत्रों का निर्माण गीत के बाद संगत करने के लिए किया गया। प्राचीनकालीन संगीत का अध्ययन करने से हमें यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में सर्वप्रथम अनिबद्ध गान का प्रचार था, जिसके चार प्रकार प्रचलित थे— रागालाप, रूपकालाप, आलप्ति और स्वस्थान। उसके पश्चात् संगीत में गायन के साथ लय देने के लिए झांझ, मंजीरा, डमरू आदि का प्रयोग किया जाने लगा। धीरे-धीरे उसके साथ वीणा, मृदंग, दरदुर आदि वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग किया जाने लगा, जिससे उसकी गणना निबद्ध संगीत के अंतर्गत होने लगी। |
| Area | संगीत |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/07 |
| How to Cite | कुमारी, प्रियंका. (2026). संगीत की उपशास्त्रीय विधाओं का अवलोकन. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 67-70. |
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