| Paper Title | बज्जिका लोकगीतों की परम्परा और प्रभाव |
| Author(s) | सुरभि रानी, प्रो. स्वस्ति वर्मा. |
| Country | India |
| Abstract | संगीत आनंद का अविर्भाव है। संगीत से अध्यात्म प्रकाशित होता है। संगीत ईश्वर का स्वरूप है। मानव ने संगीत प्रकृति से सीखा है। सृष्टि के कण-कण में अलौकिक संगीत व्याप्त है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि का जन्म ही नाद के कारण हुआ। सृष्टि को ‘नादेन जायते’ कहा गया है। पंडित शारंगदेव ने अपने ग्रंथ संगीत रत्नाकर में नाद का वर्णन करते हुए लिखा है— “ब्रह्मा नाद रूपो स्मृतः।” अर्थात इन्होंने परमपिता ब्रह्मा को नाद के रूप में स्वीकार किया है। नाद की गणना संगीत के आधारभूत तत्त्वों में की जाती है और सारा जगत को नाद के ही अधीन माना गया है। विद्वानों के अनुसार संगीत के द्वारा मनुष्य प्राचीन काल से ही मनोरंजन की प्राप्ति करता आ रहा है। प्राचीन काल में संगीत मनोरंजन के साथ-साथ मुक्ति प्राप्त करने का भी एक प्रमुख साधन था। सामान्यतः मुक्ति-प्राप्ति के उद्देश्य से जिस संगीत का गायन किया जाता था, उसे मार्गी संगीत के नाम से जाना जाता है और मनोरंजन के उद्देश्य से जिस संगीत का प्रयोग किया जाता था, उसे लौकिक संगीत के नाम से संबोधित किया गया है। लौकिक संगीत के अंतर्गत गाए जाने वाले गीत ही आगे चलकर लोकगीतों के नाम से प्रचलित हुए, जिनका गायन आज के समय में साधारण या सामान्य लोगों के द्वारा किया जाता है। इन लोकगीतों के अंतर्गत भिन्न-भिन्न प्रदेशों एवं क्षेत्रों में नाना प्रकार के लोकगीतों का गायन किया जाता है। इन लोकगीतों का एक प्रचलित एवं प्रसिद्ध प्रकार है बज्जिका लोकगीत, जिसका वर्णन इस शोध-पत्र में मैं भली-भांति करने का प्रयास कर रही हूँ। |
| Subject Area | संगीत |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/07 |
| How to Cite | सुरभि रानी एवं स्वस्ति वर्मा (2026). बज्जिका लोकगीतों की परम्परा और प्रभाव. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 71–74. |
| License |
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