| Article Title |
समकालीन हिंदी नवगीत : शहरी जीवन का यथार्थ प्रतिबिम्ब |
| Author(s) | डॉ. मदन लाल. |
| Country | India |
| Abstract |
नवगीत समकालीन अनुभूतियों का क्रमबद्ध उद्रेक है। यह वर्तमान हिन्दी साहित्य को अपने नूतन कलेवर में अनुभूति एवं लययुक्त होकर स्पंदित कर रहा है। यह अपने जन्म से ही समकालीन होने का गौरव लिए है। नवगीत के नवीन कथ्य में शहरी जीवन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यथार्थ नगरीय जीवन अपने जीवनकाल में जिन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का सामना किस भाँति करता है; वह नवगीत का कथ्य है। शहरी जीवन का वातावरण, भाग-दौड़, संघर्ष, उपभोक्तावादी मानसिकता, बाजारवाद, अपसंस्कृति, अलगाव, यांत्रिकता, कुंठा, घुटन, थकन, उलझन एवं अपने अस्तित्व के लिए प्रयास जीवन को बोझिल बना देते है। नवगीत अपनी यात्रा में इन्हें सहयात्री बनाकर चल रहा है। यह नगरीय जीवन के हर उस हृदय में झाँककर अभिव्यक्त हुआ है जिसने बिना किसी आनाकानी के इसे भीतर प्रवेश होने दिया; किंचित् हृदय समुद्रों के अनुभूति मोक्तिक लब पुलिन पर आना अभी शेष है, जिसे अतल गहराई में जाकर ही समेटना श्रेयस्कर होगा। |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/05/23 |
| How to Cite | मदन लाल (2026). समकालीन हिंदी नवगीत : शहरी जीवन का यथार्थ प्रतिबिम्ब. Shodh Sangam Patrika, 3(2), 46–53. |
View / Download PDF File