Volume: 3 Issue: 2 (April - June 2026)
| Sr No. | Paper Information |
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Author(s):
नेहा चौबे.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-6 |
धूमिल के काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोणAbstractशोध सार - समकालीन कविता में धूमिल मील के पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित हुए है। इनके बिना समकालीन कविता की मुकम्मल तस्वीर बनती दिखाई नहीं देती। धूमिल की कविताओं में आम जनता, किसान, मजदूर, श्रमिक और उपेक्षित लोग जिनका निर्ममता से शोषण किया जा रहा हैं, उनके प्रति अपनी आवाज को निर्भयता और दृढ़ता से उठाने का प्रयास किया है। धूमिल ने सर्वहारा वर्ग के प्रति मानवीय संवेदना तथा सदियों से हो रहे शोषण को अपनी कविताओं का विषय बनाया हैं। वह शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति के साथ अपनी वेदना को वाणी देने का प्रयास किया हैं। जनशक्ति को बढ़ाने के लिए अपनी कविता को आधार बनाया हैं। शोषित वर्ग, पूंजीवादी तथा सत्ताधारी वर्ग का विरोध किया हैं। हिंसा का विरोध करते हुए अहिंसा को मानवतावाद से सफलतापूर्वक जोड़ने की कोशिश करना चाहते हैं। इनकी कविता आम जनता को मानवीय मूल्यों की गहराई तक पहुंचती हैं और उन्हें स्थापित भी करती हैं। इनकी कविता समाज,व्यवस्था तंत्र और राजनीतिक पृष्ठभूमि को उजागर करती है। उनकी कविता आम आदमी के अनुभव को महसूस करती हैं, और उस परिस्थितियों की ज्वाला को आत्मसात भी करती हैं। वह समस्त जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त अपनी कविताओं के माध्यम किया हैं। उनकी कृति भारतीय जनतंत्र में स्वतंत्रता, न्यायपूर्णता,समानता, बंधुत्वता और धर्मनिरपेक्षता को काफी महत्व देने का प्रयास करती है। मूलरूप से स्वतंत्रता के पश्चात् समाज में पूंजिवादी व्यवस्था का विकास तथा जनसाधारण का शोषण के विरुद्ध की वाणी इस दौर के कविताओं में प्रकाशित होती हैं। उनकी कविताओं के माध्यम से जनता के आशा की अभिव्यक्ति को स्पष्ट रूप से पाठक तक पहुंचाया जा सकता हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि समकालीन कवियों की दृष्टि काफी व्यापक और सजग हैं। इनकी वैचारिक दृष्टि और भाषा सरल होने के बावजूद भी पाठक के हृदय स्थल को उद्वेलित करती है। धूमिल प्रगतिशील लेखन सम्मेलन से जुड़े थे तथा सभी जगह अपनी संलग्नता और तीक्ष्णता का परिचय दिया हैं। समकालीन हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, अरुण कमल, चंद्रकांत देवताले और राजेश जोशी का प्रमुख स्थान हैं। इन कवियों में मोहभंग, जनतंत्र, शोषण और आक्रोश के दौर में व्यवस्था के विरुद्ध आम आदमी की पीड़ा और यथार्थवादी भाव को व्यक्त किया हैं। | |
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Author(s):
डॉ. पुष्प लता कुमारी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
7-11 |
रेहन पर रग्घू में ग्रामीण एवं आधुनिक परिवेश के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तेAbstractकाशीनाथ सिंह द्वारा रचित ‘रेहन पर रग्घू' अपने समय की उत्कृष्ट कृति है। यह अत्यंत गंभीर विषय एवं बदलते सामाजिक मूल्य पर आधारित उपन्यास है। आज के संदर्भ में यह उपन्यास अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह ‘व्यक्ति के अकेलेपन‘ को चरितार्थ करती है। परिस्थितिवश गाँव एवं शहर में परिवारों के दो अलग-अलग स्थानों पर रहने से आपसी समन्वय की कमी देखने को मिलती है। समयाभाव, व्यस्तता, आधुनिक जीवन की लालसा, इच्छाशक्ति में कमी एवं बात-व्यवहार के कारण व्यक्ति परिवार से दूर हो अकेलेपन का शिकार हो जाता है। उपन्यासकार ने रघुनाथ के माध्यम से उसके अकेलेपन एवं संघर्ष को दर्शाने का प्रयास किया है। परिस्थितिवश अपने भरे-पूरे परिवार जिसमें पत्नी, दो बेटे और एक बेटी होने के बावजूद भी रघुनाथ को बुर्जुगावस्था में अकेले जीवन जीने को विवश होना पड़ता है। जिस उम्र में व्यक्ति को अपने परिवार के साथ और सहयोग की आवश्यकता होती है, उस उम्र में व्यक्ति का अकेले जीवन व्यतीत करना बङा कष्टकारक होता है। ‘व्यक्ति का अकेलापन‘ आज के समाज के लिए अत्यंत सोचनीय, गंभीर एवं खतरनाक अवस्था है क्योंकि आज नयी पीढी इसी ढर्रे पर चल रही है। आज व्यक्ति को अपने बुर्जुगों से सम्मान, प्यार अपनापन और साझेदारी बना कर रखना चाहिए जिससे उनका जीवन आसानी से कट सके। काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास में विविध पात्रों के माध्यम से आधुनिक जीवन की इस विङम्बना का विस्तृत विवेचन किया है। | |
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Author(s):
अमर बहादुर.
Country:
India
Research Area:
दर्शनशास्त्र
Page No:
12-19 |
महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन: सिद्धांत और व्यवहारिकता का विश्लेषणAbstractयह शोध पत्र महात्मा गांधी के शिक्षा दर्शन के सिद्धांतों एवं उसकी व्यवहारिकता का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधीजी ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का साधन न मानकर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम माना है, जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों आयामों का संतुलित विकास शामिल है। उनके शिक्षा दर्शन का प्रमुख आधार ‘नई तालीम’ है, जो कार्य-आधारित शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा नैतिक मूल्यों पर आधारित है। इस अध्ययन में गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों जैसे—सत्य, अहिंसा, श्रम की गरिमा, मातृभाषा में शिक्षा तथा चरित्र निर्माण—का विश्लेषण किया गया है। शोध में गुणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों, जैसे पुस्तकों, शोध पत्रों एवं सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि गांधीवादी शिक्षा सिद्धांत व्यवहार में किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गांधीजी का शिक्षा दर्शन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर वर्तमान समय में जब शिक्षा अधिकतर परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 में भी गांधीवादी शिक्षा के तत्व, जैसे कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम तथा मूल्य-आधारित शिक्षा, स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। हालांकि, आधुनिक तकनीकी युग में गांधीवादी शिक्षा के पूर्ण कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे संसाधनों की कमी, पारंपरिक शिक्षा प्रणाली का प्रभुत्व तथा तकनीकी शिक्षा के साथ संतुलन की आवश्यकता। अतः यह कहा जा सकता है कि यदि गांधीजी के शिक्षा सिद्धांतों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कर लागू किया जाए, तो यह शिक्षा प्रणाली को अधिक मानवीय, व्यावहारिक एवं प्रभावी बना सकता है। | |
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Author(s):
डॉ. सुमिता.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
20-25 |
चारुचंद्र चंदोला के काव्य में वर्णित मानवेत्तर चेतन जगत का सौंदर्य वर्णनAbstractउत्तराखंड के प्रसिद्ध साहित्यकार व पत्रकार चारुचंद्र चंदोला ने अपनी साहित्य यात्रा में अनेक काव्यों का सृजन किया तथा सभी काव्यों में आंचलिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक परिवेश को प्रमुखता से उजागर किया है। चारुचंद्र जी का बाल्यकाल पर्वतीय परिवेश में व्यतीत होने के कारण उनके मानस व हृदय पर पहाड़ के प्रतिबिंब की झलक स्पष्टतः दृष्टिगत होती है। सौंदर्य के मानवीय व प्राकृतिक अनेक पक्षों का चारु जी ने अत्यंत सूक्ष्मता से विवेचन किया है। समय व परिस्थितियों का वास्तविक अंकन पर आधारित सौंदर्य चारु जी ने निरूपित किया है। कवि अपने विचारों को अत्यंत स्पष्टता, बेबाकी व कटाक्ष के साथ-साथ व्यंग्यात्मक रूप से व्यक्त करते थे। प्रस्तुत शोध पत्र में चारुचंद्र चंदोला के काव्य में वर्णित मानवेत्तर चेतन जगत के सौंदर्य पर प्रकाश डाला गया है। | |
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Author(s):
संदीप कौर.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
26-31 |
मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ में नारी अस्मिता और आत्मसंघर्षAbstractमेरे शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ में नारी संवेदना की अभिव्यक्ति को समझना है। मृदुला गर्ग एक शांत, संकोची तथा अंतर्मुखी स्वभाव की लेखिका हैं। उनका उपन्यास ‘कठगुलाब’ नारी भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाली एक सशक्त कृति है, जिसमें स्त्री पर होने वाले अन्याय, अत्याचार और उसकी पीड़ा के साथ-साथ स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता को अत्यंत संवेदनशील रूप में चित्रित किया गया है। ‘कठगुलाब’ का प्रतीकात्मक अर्थ “नारी की जिजीविषा” है। लेखिका का मानना है कि स्त्रियाँ साधारण गुलाब की तरह नहीं होतीं, जो स्वतः ही खिल उठें, बल्कि वे कठगुलाब की भाँति होती हैं, जिन्हें खिलने के लिए विशेष देखभाल और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। | |
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Author(s):
विजय पाल.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
32-36 |
हरियाणा के लोक नाट्य सांग में अभिनय की सहज़ता और माईज़नर अभिनय तकनीक:तुलनात्मक अध्ययनAbstractलोक नाट्य सांग हरियाणा के लोक जीवन की परंपराओं का अहम हिस्सा है। सांग के अभिनेता को सांगी कहा जाता है। सांगी गायन, संवाद और शारीरिक गतियों द्वारा लोक जीवन के कथानकों का कलात्मक प्रदर्शन करता है। साँगों का ताना-बाना विविन्न प्रकार के लोक गीतों से उपज़े कला-तन्तुओं से बुना हुआ है। साँग में यह रागिनी का जादू ही है, जो सिर चढ़कर बोलता है। एक हाथ कान पर रखकर और दूसरे को आकाश में उठाकर अभिनेता जब एक विशेष अन्दाज़ में अपनी रागिनी गाता है, तो समां बँध जाता है। सांगी अक्सर दर्शकों से जुड़ने के लिए हास्य व्यंग्य, गीत और अतिशयोक्तिपूर्ण हाव-भाव का उपयोग करता है, चुंकि सांगी क्षेत्र के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने बाने में रमा होता है इसलिये इसके अभिनय में सहज़ गतिशीलता और तालमेल दिखाई देता है। यह सहज़ गतिशीलता और तालमेल दर्शक को भावनात्मक रूप से प्रदर्शन के साथ जोड़ देती है। वहीं दुसरी तरफ माईज़नर अभिनय तकनीक अभिनेता को पल में रखते हुए सच्ची भावनाओं को जीना सिखाती है। यह तकनीक अमेरिकी अभिनय प्रशिक्षक सेन्फोर्ड माईज़नर द्वारा विकसित की गई है इसका उदैश्य अभिनेता को सहज़ बनाना है ताकि अभिनेता दृश्य में दि गई काल्पनिक परिस्थितियों में सत्यता से व्यवहार कर सके जिससे दृश्य जीवन का हिस्सा लगे। यह तकनीक सैन्फोर्ड माईज़नर द्वारा लम्बे समय तक दिये गये अभिनय प्रशिक्षण के अनुभवों पर आधारित है। यह शोध पत्र उत्तर भारत में स्थित हरियाणा के लोक नाट्य सांग में अभिनय की सहज़ता और माईज़नर अभिनय तकनीक द्वारा अभिनेता को सहज़ बनाने की प्रक्रिया का तुलनात्मक अध्ययन है। | |
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Author(s):
डॉ. ममता ध्यानी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
37-41 |
संत काव्यधारा में ‘विपश्यना’Abstractहिंदी साहित्य में मुख्य रूप से भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा को संत काव्यधारा की संज्ञा दी जाती है। इसके अंतर्गत संतों की एक लंबी परंपरा है जो भक्तिकाल से लेकर मध्ययुग उत्तरार्ध तक दिखाई देती है। ‘विपश्यना’(संस्कृत) या ‘विपस्सना’(पालि) सिद्धार्थ गौतम जो बाद में बुद्ध हुए के द्वारा अविष्कृत ध्यान की एक शुद्ध वैज्ञानिक पद्धति है जिसके द्वारा उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त किया। इसका अर्थ है-विशेष प्रकार से देखना (वि+पश्य+ना)। भारत की यह प्राचीन विद्या बुद्ध के बाद एक लंबे समय तक भारत में रही और फिर अपने शुद्ध रूप में लुप्त हो गई। कुछ अन्य पड़ोसी देशों में बहुत कम लोगों ने गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा इस विद्या को इसके शुद्धतम रूप में जीवित रखा। भारत में 70 के दशक में श्री सत्यनारायण गोयनका(पद्मभूषण) द्वारा इस साधना पद्धति को पुनः स्थापित किया गया। आज अपने व्यावहारिक रूप में भारत और विश्व के अन्य देशों में इस साधना पद्धति को सैकड़ों केंद्रों में सिखाया जाता है। संत काव्यधारा के संतों ने अनुभूति पक्ष पर विशेष बल दिया है जो विपश्यना विद्या का मूल है और गहराई से देखने पर इस काव्याधरा के संतों की वाणी में सर्वत्र विपश्यना दिखाई देती है। | |
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Author(s):
अनूपा.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
42-45 |
रस्किन बॉन्ड के हिन्दी अनूदित कथा साहित्य में भारतीय नारीAbstractरस्किन बॉन्ड का कथा साहित्य भारतीय जीवन, प्रकृति और मानवीय सम्बन्धों का गहन और संवेदनशील चित्रण करता है उनके हिन्दी अनूदित लेखन में भारतीय नारी के विभिन्न पहलुओं जैसे ममता, त्याग, स्वतन्वता संघर्ष, नैतिकता और अंतर्द्वंद को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य रस्किन बॉन्ड की हिंदी अनूदित रचनाओं के माध्यम से भारतीय नारी के इन बहुआयामी रुपों का गहन विश्लेषण करना है। अध्ययन में विशेष रूप से,नीली छतरी,रस्टी के कारनामे, रस्किन बॉन्ड की लोकप्रिय कहानियां, और महारानी, जैसी रचनाओं का चयन किया गया है। | |
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Author(s):
डॉ. मदन लाल.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
46-53 |
समकालीन हिंदी नवगीत : शहरी जीवन का यथार्थ प्रतिबिम्बAbstractनवगीत समकालीन अनुभूतियों का क्रमबद्ध उद्रेक है। यह वर्तमान हिन्दी साहित्य को अपने नूतन कलेवर में अनुभूति एवं लययुक्त होकर स्पंदित कर रहा है। यह अपने जन्म से ही समकालीन होने का गौरव लिए है। नवगीत के नवीन कथ्य में शहरी जीवन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यथार्थ नगरीय जीवन अपने जीवनकाल में जिन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का सामना किस भाँति करता है; वह नवगीत का कथ्य है। शहरी जीवन का वातावरण, भाग-दौड़, संघर्ष, उपभोक्तावादी मानसिकता, बाजारवाद, अपसंस्कृति, अलगाव, यांत्रिकता, कुंठा, घुटन, थकन, उलझन एवं अपने अस्तित्व के लिए प्रयास जीवन को बोझिल बना देते है। नवगीत अपनी यात्रा में इन्हें सहयात्री बनाकर चल रहा है। यह नगरीय जीवन के हर उस हृदय में झाँककर अभिव्यक्त हुआ है जिसने बिना किसी आनाकानी के इसे भीतर प्रवेश होने दिया; किंचित् हृदय समुद्रों के अनुभूति मोक्तिक लब पुलिन पर आना अभी शेष है, जिसे अतल गहराई में जाकर ही समेटना श्रेयस्कर होगा। | |
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Author(s):
प्रो. हीरालाल शर्मा, डॉ. रमेश मालाकार.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
54-58 |
गीता में आहारों का त्रिविध भेद तथा उनके जीवन पर प्रभावAbstractयह लेख भगवद्गीता में वर्णित आहार के त्रिविध भेद- सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा उनके मनुष्य जीवन पर प्रभाव का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत करता है। लेख में बताया गया है कि आहार केवल शरीर के पोषण का साधन नहीं, अपितु मन, बुद्धि, स्वभाव और आचरण को भी प्रभावित करता है। “जैसा अन्न, वैसा मन” के सिद्धांत के आधार पर गीता में भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सात्त्विक आहार में फल, सब्जियाँ, दूध, घी आदि शुद्ध एवं पौष्टिक पदार्थ आते हैं, जो आयु, बल, स्वास्थ्य, शांति और सद्विचारों को बढ़ाते हैं। ऐसा भोजन व्यक्ति को संयमी, शांत और आध्यात्मिक बनाता है। राजसिक आहार अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन और गरम होता है, जो मन में चंचलता, उत्तेजना, चिंता और रोग उत्पन्न करता है। तामसिक आहार में बासी, अशुद्ध और रसहीन भोजन शामिल है, जो आलस्य, अज्ञान और दूषित प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है। लेख में यह निष्कर्ष बताया गया है कि मनुष्य के स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सात्त्विक आहार अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में तामसिक भोजन की बढ़ती प्रवृत्ति समाज और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक मानी गई है। इसलिए गीता के अनुसार शुद्ध, संतुलित और सात्त्विक आहार अपनाना मानव कल्याण के लिए अनिवार्य बताया गया है। | |
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Author(s):
डॉ. गौतम कुमार.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
59-67 |
भारतीय राष्ट्रवाद का उत्थान: सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषणAbstractभारतीय राष्ट्रवाद का उदय आधुनिक भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसका निर्माण केवल राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम नहीं था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक तथा वैचारिक परिवर्तनों के सम्मिलित प्रभाव से हुआ। औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय समाज अनेक सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक विषमताओं और राजनीतिक दमन से प्रभावित था। ऐसे समय में आधुनिक शिक्षा, सामाजिक सुधार आंदोलनों, प्रेस एवं साहित्य, धार्मिक पुनर्व्याख्या तथा शिक्षित मध्यम वर्ग के उदय ने भारतीय समाज में नई चेतना का संचार किया। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद के उत्थान में सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण करना है तथा यह समझना है कि किस प्रकार इन कारकों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक और जनाधार प्रदान किया। सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जातिगत असमानताओं, महिला उत्पीड़न, बाल विवाह, सती प्रथा तथा अस्पृश्यता जैसी समस्याओं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामाजिक पुनर्गठन का प्रयास किया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, स्वामी दयानन्द सरस्वती और नारायण गुरु जैसे सुधारकों ने सामाजिक चेतना एवं राष्ट्रीय एकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर आर्थिक कारकों में ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण, भूमि-राजस्व नीति, औद्योगिक अविकास, विदेशी पूंजी का वर्चस्व तथा दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित धन-निकासी सिद्धांत ने भारतीय जनता में आर्थिक असंतोष को बढ़ाया और राष्ट्रवादी चेतना को प्रबल किया। यह अध्ययन ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें पुस्तकों, शोध आलेखों, अभिलेखीय दस्तावेजों तथा द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरण और आर्थिक शोषण के विरुद्ध उत्पन्न सामूहिक चेतना का परिणाम था, जिसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार और वैचारिक दिशा प्रदान की। | |
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Author(s):
डॉ. अतुलकुमार भीखाभाई उनागर.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
68-76 |
अनन्यता का विज्ञान : मानव सामर्थ्य एवं प्राकृतिक नियति का दार्शनिक अध्ययनAbstractशोध-संक्षेप (Abstract) : इस शोधपत्र में प्राचीन चिंतन के गूढ़ और शाश्वत दार्शनिक सिद्धांतों तथा वर्तमान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच के तात्त्विक अध्ययन के पश्चात मानव-जीवन में 'अनन्यता' के विज्ञान का संपूर्ण अवलोकन और विश्लेषण किया गया है। जगत का प्रत्येक छोटा-बड़ा घटक एक सुव्यवस्थित वैश्विक-अनुशासन (ऋत) और नियतिबद्ध कार्य-कारण संबंध की श्रृंखला से सुनियोजित रूप से संचालित है। इस सार्वभौमिक नियम के अंतर्गत प्रत्येक मानव का जीवन भी एक निश्चित वैयक्तिक स्वरूप, नैसर्गिक गुण-सामर्थ्य और प्रत्येक की भिन्न-भिन्न जैविक-मानसिक सीमाओं के एक निश्चित 'प्रकृति-संपुटन' के साथ जन्म लेता है। सांख्यदर्शन के पुरुषार्थ-प्रवृत्ति नियम, भगवद्गीता के स्वधर्म-निरूपण तथा आधुनिक विभेदक मनोविज्ञान के 'वैयक्तिक भिन्नता' के सिद्धांत से यह प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य की अंतर्निहित सिद्धियां/शक्तियां तथा मर्यादाएं ही उसके वास्तविक जीवन-कार्य, योगदान तथा कार्यक्षेत्र का निर्धारण करती हैं। इस शोध का मुख्य निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि अन्यों के बाह्य अनुकरण के स्थान पर अपनी सहज प्रकृतिदत्त अनन्यता की सच्ची पहचान और आत्मबोध ही मानवीय सामर्थ्य या सफलता का मूल स्रोत है, जिसके द्वारा स्व से वैश्विक कल्याण, सार्थक जीवन और नूतन महासर्जन संभव बनता है, इस सिद्धांत को समझने वाले प्रत्येक मानवजीवन का उद्धार निश्चित ही है। | |
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Author(s):
डॉ. कोमल शैलेषभाई भट्ट.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
77-83 |
महाभारते वृक्षचैतन्यविमर्शःAbstractवृक्षे चैतन्यमस्ति इति विषयः प्राचीनकालात् विचारणीयः अस्ति। अस्मिन् शोधपत्रे वेद, उपनिषद् तथा महाभारतादि ग्रन्थानां आधारेण वृक्षचैतन्यस्य विवेचनं कृतम्। विशेषतः महाभारतस्य शान्तिपर्वणि वर्णितः भारद्वाज–भृगुसंवादः अस्य अध्ययनस्य मुख्याधारः अस्ति। तत्र वृक्षेषु चैतन्यस्य अस्तित्वं तर्कसंगतरीत्या प्रतिपादितम्। अध्ययनस्य उद्देश्यं वृक्षेषु चेतनास्वरूपं दार्शनिकतया, शास्त्रीयतया तथा वैज्ञानिकदृष्ट्या परीक्षणम्। निष्कर्षतः प्रतिपद्यते यत् वृक्षाः केवलं जडपदार्थाः न, अपितु संवेदनशील-चेतनयुक्तजीवाः सन्ति। वृक्षे चैतन्यमस्ति तस्मिन् विषये प्रायः वयं पृच्छामः तदा तस्य संशोधकरूपेण अस्माकं भारते जगदीशचन्द्र बोझ इति नाम मुखे आगच्छति किन्तु महाभारते यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ।। तदनुसारं महाभारते सर्वज्ञानं वर्तते । | |
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Author(s):
कुशाल सिंह.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
84-89 |
हिमाचल प्रदेश के मडी जनपद के सराज क्षेत्र की संस्कृति का साहित्यिक अध्ययनAbstractशोध सारांश हिमाचल प्रदेश में लोक साहित्य और लोक संस्कृति काफी समृद्ध है | हिमाचल को देवभूमि कहा जाता है | यंहां की संस्कृति में देव परपरा , लोक भाषा और धार्मिक परम्परा की अपनी विशिष्ट पहचान मिलती है | यहाँ की लोक व् देव संस्कृति में धार्मिक आस्था और सामाजिक संबंधों की अपनी विशिष्ट पहचान है | हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले का सराज क्षेत्र अपनी लोक परम्परा तथा सामाजिक जीवन के कारण अपनी विशिष्ट पह्चान रखता है | सराज की लोक संस्कृति सामाजिक संबंधों तथा धार्मिक आस्था की भावना का जीवंत दस्तावेज है | सराज की लोक संस्कृति में लोक गीत ,लोक जीवन की संवेदनायों ,सामाजिक संबंधों , प्रकृति , प्रेम ,देव आस्था और सामाजिक जीवन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है | सराज की लोक संस्कृति लोक साहित्य और लोक जीवन की सामूहिक चेतना को समृद्ध बनाती है | यह शोधपत्र हिंदी साहित्य में लोकबोध तथा स्थानीय ज्ञान परंपराओं की भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हिंदी साहित्य ने लोकसाहित्य को अभिव्यक्ति देकर स्थानीय ज्ञान को संरक्षित और संप्रेषित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। यह अध्ययन प्रतिपादित करता है कि लोकबोध साहित्य को सामाजिक यथार्थ से जोड़ता है तथा समकालीन विमर्श को मानवीय और जनोन्मुख बनाता है। प्रस्तुत शोध पत्र में मंडी जनपद के सराज क्षेत्र के लोक साहित्य के सांस्कृतिक और धार्मिक स्वरूप की विशेषताओं तथा वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता का अध्ययन किया गया है। | |
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Author(s):
Munna Ram Mahto, Dr. Shilpy Raaj.
Country:
India
Research Area:
शिक्षा शास्त्र
Page No:
90-96 |
प्राथमिक शिक्षा में प्रभावी शिक्षण-अधिगम हेतु मातृभाषा की भूमिका: एक अध्ययनAbstractराष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इस नीति में विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न आयामों के साथ-साथ शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा, स्थानीय भाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग पर विशेष बल दिया गया है। भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान की वाहक भी हैं। ऐसे में शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया में भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार प्रारंभिक और प्राथमिक स्तर पर बच्चों को यथासंभव उनकी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। नीति का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे विषय-वस्तु को अधिक सहजता से समझते हैं, अपनी अभिव्यक्ति बेहतर ढंग से कर पाते हैं तथा उनकी रचनात्मक एवं संज्ञानात्मक क्षमताओं का अधिक प्रभावी विकास होता है। मातृभाषा आधारित शिक्षण न केवल सीखने की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाता है, बल्कि विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ता है। हालाँकि, किसी भी शैक्षिक नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य दोनों सरकारों पर समान रूप से है। मातृभाषा आधारित शिक्षा को सफल बनाने के लिए स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री, प्रशिक्षित शिक्षकों, उपयुक्त शिक्षण-संसाधनों तथा प्रशासनिक सहयोग की आवश्यकता है। यह लेख राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में विद्यालयी शिक्षा में मातृभाषा आधारित शिक्षण-अधिगम की अवधारणा, उसकी प्रासंगिकता, संभावनाओं तथा चुनौतियों का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है और गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा के निर्माण में मातृभाषा की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। | |
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Author(s):
नितेश बौड़ाई.
Country:
India
Research Area:
ज्योतिष
Page No:
97-101 |
संहिता ग्रंथों में रत्न विज्ञानAbstractप्राचीन संहिता ग्रंथों में रत्नों का वर्णन केवल अलंकारिक वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि ज्योतिष, आयुर्वेद, धर्म, राजनीति तथा सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग के रूप में प्राप्त होता है। वैदिक साहित्य, बृहत्संहिता, गर्गसंहिता, अग्निपुराण, अर्थशास्त्र तथा रसरत्नसमुच्चय आदि ग्रंथों में रत्नों की उत्पत्ति, स्वरूप, गुण, दोष, परीक्षा तथा उपयोग का विस्तृत विवेचन मिलता है। इन ग्रंथों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय आचार्यों को रत्नों के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों का गहन ज्ञान था। संहिता ग्रंथों में मुख्यतः नवरत्नों — माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुष्पराज, हीरा, नीलम, गोमेद तथा वैदूर्य — का वर्णन प्राप्त होता है। प्रत्येक रत्न को किसी न किसी ग्रह से संबंधित माना गया है तथा उनके शुभाशुभ प्रभावों का उल्लेख किया गया है। बृहत्संहिता में रत्नों की शुद्धता, चमक, रंग, कठोरता एवं दोषों की परीक्षा का अत्यंत वैज्ञानिक वर्णन मिलता है।आयुर्वेदिक ग्रंथों में रत्न भस्म के निर्माण तथा उनके चिकित्सीय प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। इनका उपयोग मानसिक शांति, रोग निवारण तथा शारीरिक शक्ति-वृद्धि हेतु किया जाता था। इससे ज्ञात होता है कि भारतीय चिकित्सा पद्धति में रत्न विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। | |
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Author(s):
डॉ. प्रियंका कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
102-105 |
हिन्दुस्तानी संगीत में फिल्मों का योगदानAbstractआज के युग में सिनेमा एक ऐसी विधा है, जिसकी ओर दो साल का एक बच्चा और अस्सी साल का एक बूढ़ा भी अकर्षित है। एक महानगर से लेकर छोटे से कस्बे का व्यक्ति भी इसके सम्मोहन से अछूता नहीं हैं। सिनेमा अपने आप में एक सम्पूर्ण विधा है, क्योंकि इसमें चित्रकला, नाट्य कला, काव्य कला, कथा साहित्य आदि सभी कलाओं का समावेश रहता हैं। आज हम जो सिनेमा देखते है वह हमारे सामने एक विकसित और परिष्कृत रूप है, इसके पीछे एक सदी का परिश्रम है। वर्तमान समय में सिनेमा ने उद्योग रूप ले लिया है परन्तु इसने हमें न केवल मनोरंजन ही दिया है, बल्कि शिक्षा भी दी है, इसलिए यह जनमानस की भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम बन गया है। इसलिये यह कहना गलत न होगा कि “फिल्में मनोरंजन का उत्तम माध्यम तो हैं ही, साथ ही वह ज्ञानवर्धन के लिए भी अत्यंत बेहतरीन माध्यम हैं।” आजकलए संगीत और फिल्म आपस में इस तरह जुड़ गए हैं कि वे ऐसी कला का निर्माण कर रहे हैं जो दर्शकों को भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर प्रभावित करती है। इससे यह प्रश्न उठता है कि संगीत फिल्मों और उनके दर्शकों की किस प्रकार सेवा करता है, इस प्रश्न ने फिल्म उद्योग के विद्वानों निर्देशकों और कार्यकर्ताओं की रुचि को आकर्षित किया है और फिल्मों में व्यक्त किए जाने वाले मूल्यों और कथाओं को गहराई से प्रभावित किया है। व्यापक अध्ययनों और शोधों ने विभिन्न दृष्टिकोणों को बढ़ावा दिया है। अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि संगीत फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ ही फिल्में संगीत की शक्ति को बढ़ाती हैं। ध्वनियाँ और संगीत फिल्मों में वातावरण स्वर और पात्रों को आकार देते हैं और फिल्म क्लिप संगीत ध्वनियों को अधिक कोमल भावनाओं और संवेदनाओं में बदल देते हैं। यह गतिशील संबंध इन दो कला रूपों के मिश्रण के महत्व को उजागर करता है। | |
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Author(s):
विवेक शर्मा, प्रो. रक्षा सिंह.
Country:
India
Research Area:
अर्थशास्त्र
Page No:
106-113 |
भारत में लिनेन वस्त्रों के प्रति उपभोक्ताओं की जागरूकता, प्राथमिकता एवं खरीद व्यवहार का अध्ययनAbstractआज जब पूरी दुनिया में पर्यावरण के प्रति सजगता बढ़ रही है, तब प्राकृतिक और टिकाऊ वस्त्रों की माँग भी तेजी से बढ़ रही है। लिनेन - जो सन के पौधे से प्राप्त एक प्राचीन प्राकृतिक रेशा है - अपनी श्वास-क्षमता, टिकाऊपन, और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन प्रक्रिया के कारण वैश्विक वस्त्र बाजार में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना रहा है। भारत में भी, विशेषतः शहरी उपभोक्ताओं के बीच, लिनेन वस्त्रों के प्रति रुचि बढ़ी है, परंतु इस क्षेत्र में व्यवस्थित शोध अभी सीमित है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य भारतीय उपभोक्ताओं में लिनेन वस्त्रों के प्रति जागरूकता, प्राथमिकता एवं खरीद व्यवहार को समझना है। शोध में यह जानने का प्रयास किया गया है कि उपभोक्ता लिनेन के गुणों - जैसे आराम, जीवाणु-रोधी विशेषताएँ, पर्यावरणीय स्थिरता और दीर्घायु - के बारे में कितना जानते हैं, और ये जानकारियाँ उनके क्रय निर्णयों को किस हद तक प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही, मूल्य संवेदनशीलता, सांस्कृतिक जुड़ाव, और पर्यावरणीय स्तर जागरूकता जैसे कारकों की भूमिका का भी विश्लेषण किया गया है। विभिन्न शोध अध्ययनों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता व्यवहार केवल उत्पाद की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों, प्रतिष्ठित गुणवत्ता और व्यक्तिगत दृष्टिकोण से भी गहराई से जुड़ा होता है। यह अध्ययन नीति-निर्माताओं, व्यापारियों और वस्त्र उद्योग के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत करता है ताकि भारत में लिनेन वस्त्रों की स्वीकार्यता और माँग को मजबूत किया जा सके। | |
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Author(s):
डॉ. अमित कुमार.
Country:
India
Research Area:
राजनीति विज्ञान
Page No:
114-127 |
भारत में महिला आरक्षण और राजनीतिक सहभागिता का बदलता स्वरूप: एक आलोचनात्मक मूल्यांकनAbstractमहिला और पुरुष दोनों एक दूसरे के सम्पूरकता के पर्याय है और दोनों का जीवन सहजीविता का जीवंत प्रमाण भी है लेकिन पितृ सत्तात्मक सामाजिक संरचना के कारण महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व काफी नगण्य है। 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन अधिनयम 1992 के माध्यम से भारत में महिला आरक्षण पहली बार लागू हुआ। इसके कारण कारण पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 46 % के करीब पहुंच चुकी है लेकिन संसद और विधानमंडल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी कम है। लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व मात्र 13.6% है तो राज्यसभा में मात्र 12.6 % है। भारत सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनयम 2023 के माध्यम से लोकसभा एवं राज्य / केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभा में एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए संवैधानिक रूप से आरक्षित किया गया है लेकिन अभी यह अधिनयम लागू नहीं हो सका है। महिला आरक्षण के समक्ष उप वर्गीकरण और परिसीमन की समस्या बनी हुई है। उम्मीद है इस अधिनियम के लागू होने से भारतीय लोकतंत्र में लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय की स्थापना होगी । भारतीय लोकतंत्र ज्यादा समावेशी और समतामूलक होगा । नीति निर्माण और निर्णय निर्माण में महिलाओं की सहभागिता बढ़ेगी एवं भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा | |
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Author(s):
दिनेश कुमार, शोभा मिश्रा.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
128-136 |
कहलूर रियासत में जुग्गा आंदोलन: औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध कृषक प्रतिरोधAbstractसार यह शोध पत्र कहलूर रियासत में हुए जुग्गा आंदोलन का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो औपनिवेशिक काल में कृषक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण था। यह आंदोलन अत्यधिक राजस्व भार, बेगार प्रथा तथा प्रशासनिक दमन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ, जिसने ग्रामीण समाज में व्यापक असंतोष को जन्म दिया। प्रस्तुत अध्ययन में आंदोलन के कारणों, स्वरूप एवं प्रभावों का विश्लेषण किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ी रियासतों में कृषक समुदाय ने औपनिवेशिक तथा रियासती सत्ता के विरुद्ध संगठित और सशक्त प्रतिरोध किया। अध्ययन के निष्कर्षों से यह पाया गया कि जुग्गा आंदोलन केवल आर्थिक असंतोष तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतीक और सामूहिक चेतना द्वारा संगठित प्रतिरोध की गहन भूमिका थी। यह शोध न केवल इस आंदोलन के क्षेत्रीय महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि हिमालयी रियासतों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना पर इसके प्रभाव को भी उजागर करता है। कूट शब्द: जुग्गा आंदोलन, कहलूर रियासत, कृषक प्रतिरोध, बेगार प्रथा, औपनिवेशिक प्रशासन, दूम्ह, ग्रामीण असंतोष, सांस्कृतिक प्रतीक, सामाजिक चेतना | | |
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Author(s):
Dr. Dhanu Murmu.
Country:
India
Research Area:
भाषा विज्ञान
Page No:
137-143 |
भाषा नीति और जनजातीय शिक्षा: संताली भाषा शिक्षा का आलोचनात्मक विश्लेषणAbstractसारांश भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। यहां लगभग 121 मुख्य भाषाएं और 19,500 से ज्यादा मातृभाषाएं और बोलियां हैं। इनमें से मात्रा 22 भाषा भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में अनुसूचित भाषा में आती हैं, जैसे- हिंदी, बंगाली, मराठी, तेलुगु, तमिल, गुजराती, आदि) । संताली और बोडो, भाषा मात्रा दो आदिवासी भाषा इसमें शामिल हैं। भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ भाषा हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जनजातीय समुदायों की भाषाएँ न केवल बातचीत का एक तरीका हैं, बल्कि वे उनके ज्ञान, संस्कृति, इतिहास और जीवन के दर्शन को भी दर्शाती हैं। भारतीय संविधान ने भाषाई विविधता को देश की सांस्कृतिक धरोहर माना है लेकिन शिक्षा प्रणाली में कई जनजातीय भाषाएं अभी भी पीछे हैं। संताली भाषा, जिसे 2004 में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया । यह जनजातीय भाषाओं को बचाने और बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इसके बावजूद संताली भाषा की शिक्षा कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। इस शोध पत्र में भारतीय भाषा नीति, मातृभाषा आधारित शिक्षा और संताली भाषा शिक्षा की वर्तमान स्थिति का गहन अध्ययन किया गया है। अध्ययन से पता चलता है कि संवैधानिक सुरक्षा और नीति संबंधी प्रावधानों के बावजूद संताली भाषा अभी भी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। संताली भाषा, जो हमारे देश की प्रमुख आदिवासी भाषाओं में से एक है, को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने के बावजूद शिक्षा प्रणाली में इसका उपयोग उतना नहीं हो पाया है जितना होना चाहिए। मुख्य शब्द: भाषा नीति, जनजातीय शिक्षा, संताली भाषा, मातृभाषा शिक्षा, भाषाई अधिकार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020। | |
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Author(s):
डॉ. राम धनी पाल.
Country:
India
Research Area:
समाजशास्त्र
Page No:
144-152 |
युवाओं में बढ़ती नशाखोरी की समस्या: कारण और प्रभावAbstractयुवा वर्ग किसी भी समाज और राष्ट्र की रचनात्मक ऊर्जा, सामाजिक परिवर्तन और विकास का मुख्य आधार माना जाता है लेकिन वर्तमान समय में युवाओं में बढ़ती नशाखोरी गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में सामने आ रही है। प्रस्तुत शोध-पत्र में नशाखोरी को केवल व्यक्तिगत कमजोरी या बुरी आदत न मानकर सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से जुड़ी समस्या के रूप में समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि साथियों का दबाव, गलत संगति, बेरोजगारी, पारिवारिक उपेक्षा, मानसिक तनाव, शहरीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति, सोशल मीडिया और नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता युवाओं को नशे की ओर आकर्षित करती है। नशाखोरी का प्रभाव केवल व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, यह शिक्षा, रोजगार, व्यक्तित्व-विकास, पारिवारिक संबंध, सामाजिक नियंत्रण और सामुदायिक जीवन को भी प्रभावित करता है। इसके कारण पारिवारिक कलह, आर्थिक संकट, शैक्षिक गिरावट, कार्यक्षमता में कमी, अपराध, हिंसा, सामाजिक विघटन और आत्महत्या जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह समस्या सामाजिक विचलन, अनोमी, तनाव, भिन्नात्मक सहचर्य और लेबलिंग जैसी प्रक्रियाओं से संबंधित है। अध्ययन में नशाखोरी की रोकथाम के लिए परिवार, शिक्षण संस्थानों, समाज, सरकार, परामर्श सेवाओं, पुनर्वास केंद्रों और जागरूकता कार्यक्रमों की संयुक्त भूमिका को आवश्यक माना गया है। कहा जा सकता है कि नशामुक्त युवा ही स्वस्थ परिवार, सशक्त समाज और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का आधार बन सकते हैं। | |
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Author(s):
शालिनी यादव.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
153-160 |
सुभद्रा कुमारी चौहान के कथा-साहित्य में स्त्री-चेतना और सामाजिक यथार्थAbstractप्रस्तुत शोध-पत्र में सुभद्रा कुमारी चौहान के कथा-साहित्य में सामाजिक और स्त्री-केंद्रित पक्षों का अध्ययन किया गया है। सुभद्रा को प्रायः राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की कवयित्री के रूप में स्मरण किया जाता है, किंतु उनका कथा-साहित्य भी हिन्दी साहित्य में विशिष्ट महत्त्व रखता है। उनकी कहानियों में तत्कालीन भारतीय समाज, पारिवारिक जीवन, स्त्री-अनुभव, आर्थिक अभाव, सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदना का यथार्थ चित्रण मिलता है। उनके कथा-साहित्य में स्त्री केवल करुणा या सहानुभूति की पात्र नहीं है, वह आत्मसम्मान, नैतिक साहस और चेतना से सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में सामने आती है। पारिवारिक दबाव, सामाजिक रूढ़ियाँ, जातिगत संकीर्णता, आर्थिक असमानता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री के जीवन को प्रभावित करती हैं, फिर भी वह अपनी गरिमा और मानवीय मूल्यों को बचाए रखने का प्रयास करती है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियों में दलित, वंचित और ग्रामीण स्त्री का चित्रण भी संवेदनशील दृष्टि से हुआ है। इससे उनका कथा-साहित्य मात्र स्त्री-जीवन की पीड़ा का दस्तावेज नहीं रहता, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवीयता की चेतना को भी व्यक्त करता है। सुभद्रा की कहानियाँ अपने समय के समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए स्त्री-अस्मिता, आत्मसम्मान और सामाजिक यथार्थ को प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उनका कथा-साहित्य हिन्दी कहानी परंपरा में स्त्री-चेतना और सामाजिक सरोकार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। | |
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Author(s):
विवेक कुमार भगत, डॉ. मयंक प्रकाश.
Country:
India
Research Area:
नृविज्ञान
Page No:
161-166 |
अलीपुरद्वार के वनवासी राभा समुदाय की बदलती हुई मानवता एवं व्यवहार में परिवर्तन: एक मानवशास्त्रीय अध्ययनAbstractराभा उत्तरी पश्चिम बंगाल की एक अल्पज्ञात वनवासी जनजाति है, जो मुख्यतः अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी जिलों के कुछ वन ग्रामों में निवास करती है। वन राभा समुदाय बोडो समूह से संबंधित है तथा उत्तर बंगाल में इन्हें ‘कोच’ के नाम से भी जाना जाता है। वे तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार की ‘कोचक्रो’ बोली बोलते हैं तथा उनकी शारीरिक एवं आकृति विशेषताओं के आधार पर उन्हें मंगोलीय प्रजातीय समूह से संबंधित माना जाता है। राभा समुदाय पूर्णतः वनों पर निर्भर है, इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था को वन-आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है। वे सीमित मात्रा में वन भूमि के भीतर धान की खेती भी करते हैं। परंपरागत रूप से उनका समाज मातृवंशीय रहा है, किंतु विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारणों से वर्तमान में वे मातृवंशीयता और पितृवंशीयता के बीच संक्रमण की स्थिति में हैं। वन बस्तियों में उनका जीवन एवं संस्कृति अत्यंत सरल रही है तथा उनका व्यवहार भी सहज एवं सरल रहा है। किंतु समय के साथ अनेक कारकों के प्रभाव से उनकी मानवता, सामाजिक जीवन एवं व्यवहार में परिवर्तन होने लगा है। यह शोध-पत्र समय के साथ वन राभा समुदाय में आए मानवीय एवं व्यवहारगत परिवर्तनों का अध्ययन करने का प्रयास करता है। यह अध्ययन उन कारकों को भी उजागर करता है जो राभा समुदाय की मानवता एवं व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए उत्तरदायी रहे हैं। इसके अतिरिक्त, यह शोध लेख उन विकासात्मक हस्तक्षेपों पर भी प्रकाश डालता है जिन्होंने वन राभा समुदाय के जीवन में परिवर्तन लाया है। अलीपुरद्वार की वन बस्तियों में कोविड-19 के बाद उत्पन्न मानवीय जीवन की चुनौतियों पर भी इस लेख में चर्चा की गई है। यह शोध-पत्र क्षेत्रीय (फील्ड) अध्ययन एवं गुणात्मक आँकड़ों पर आधारित है। शोध निष्कर्षों की पुष्टि के लिए कुछ केस स्टडी भी सम्मिलित की गई हैं। साथ ही, अध्ययन में द्वितीयक स्रोतों का भी उपयोग किया गया है। | |
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Author(s):
डॉ. आशुतोष.
Country:
India
Research Area:
समाजशास्त्र
Page No:
167-177 |
उच्च शिक्षा में जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग: महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के संदर्भ में एक समीक्षात्मक अध्ययनAbstractकृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विकास ने उच्च शिक्षा की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, शोध, मूल्यांकन और शैक्षणिक प्रशासन के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। विशेष रूप से जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों ने अध्ययन सामग्री के निर्माण, असाइनमेंट लेखन, शोध-विषय निर्धारण, भाषा-संशोधन, अनुवाद, प्रस्तुतीकरण, प्रोग्रामिंग तथा वैयक्तिकृत अधिगम जैसी गतिविधियों को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाया है। महाविद्यालयीन विद्यार्थी इन उपकरणों का उपयोग जटिल अवधारणाओं को समझने, त्वरित प्रतिपुष्टि प्राप्त करने, अध्ययन सामग्री तैयार करने और शोध-संबंधी प्रारम्भिक सहायता के लिए कर रहे हैं। इसके साथ ही इनके बढ़ते उपयोग ने शैक्षणिक ईमानदारी, मौलिकता, साहित्यिक चोरी, आलोचनात्मक चिंतन, तथ्यात्मक विश्वसनीयता, डेटा गोपनीयता, एल्गोरिद्मिक पक्षपात और नैतिक उत्तरदायित्व जैसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न भी उत्पन्न किए हैं। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के संदर्भ में जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शैक्षणिक उपयोग, सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों, नैतिक चुनौतियों तथा उत्तरदायी उपयोग की आवश्यकता का समीक्षात्मक विश्लेषण करना है। यह अध्ययन गुणात्मक, वर्णनात्मक एवं समीक्षात्मक शोध-पद्धति पर आधारित है। इसमें वर्ष 2020 से 2026 के मध्य प्रकाशित शोध-पत्रों, संदर्भ-पुस्तकों, सरकारी दस्तावेजों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, यूनेस्को के दिशा-निर्देशों तथा अन्य विश्वसनीय शैक्षणिक स्रोतों का विषयवस्तु विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि जनरेटिव AI विद्यार्थियों की अधिगम दक्षता, डिजिटल साक्षरता, शोध क्षमता, समस्या-समाधान कौशल और उत्पादकता को सुदृढ़ कर सकती है। तथापि इसका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट संस्थागत नीतियों, AI साक्षरता, शिक्षक प्रशिक्षण, तथ्य-सत्यापन, डेटा सुरक्षा, शैक्षणिक ईमानदारी तथा मानवीय विवेक पर आधारित संतुलित शिक्षण दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना आवश्यक है। | |