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Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Papers - Volume - 3 Issue - 3 (July - September 2026)
Paper Title

संत काव्यधारा में ‘विपश्यना’

Author(s) डॉ. ममता ध्यानी.
Country India
Abstract

हिंदी साहित्य में मुख्य रूप से भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा को संत काव्यधारा की संज्ञा दी जाती है। इसके अंतर्गत संतों की एक लंबी परंपरा है जो भक्तिकाल से लेकर मध्ययुग उत्तरार्ध तक दिखाई देती है। ‘विपश्यना’(संस्कृत) या ‘विपस्सना’(पालि) सिद्धार्थ गौतम जो बाद में बुद्ध हुए के द्वारा अविष्कृत ध्यान की एक शुद्ध वैज्ञानिक पद्धति है जिसके द्वारा उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त किया। इसका अर्थ है-विशेष प्रकार से देखना (वि+पश्य+ना)। भारत की यह प्राचीन विद्या बुद्ध के बाद एक लंबे समय तक भारत में रही और फिर अपने शुद्ध रूप में लुप्त हो गई। कुछ अन्य पड़ोसी देशों में बहुत कम लोगों ने गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा इस विद्या को इसके शुद्धतम रूप में जीवित रखा। भारत में 70 के दशक में श्री सत्यनारायण गोयनका(पद्मभूषण) द्वारा इस साधना पद्धति को पुनः स्थापित किया गया। आज अपने व्यावहारिक रूप में भारत और विश्व के अन्य देशों में इस साधना पद्धति को सैकड़ों केंद्रों में सिखाया जाता है। संत काव्यधारा के संतों ने अनुभूति पक्ष पर विशेष बल दिया है जो विपश्यना विद्या का मूल है और गहराई से देखने पर इस काव्याधरा के संतों की वाणी में सर्वत्र विपश्यना दिखाई देती है।

Subject Area हिन्दी साहित्य
Issue Volume 3, Issue 2 (April - June 2026)
Published 2026/05/23
How to Cite ममता ध्यानी (2026). संत काव्यधारा में ‘विपश्यना’. Shodh Sangam Patrika, 3(2), 37–41.

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