| Article Title |
धूमिल के काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोण |
| Author(s) | नेहा चौबे. |
| Country | India |
| Abstract | शोध सार - समकालीन कविता में धूमिल मील के पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित हुए है। इनके बिना समकालीन कविता की मुकम्मल तस्वीर बनती दिखाई नहीं देती। धूमिल की कविताओं में आम जनता, किसान, मजदूर, श्रमिक और उपेक्षित लोग जिनका निर्ममता से शोषण किया जा रहा हैं, उनके प्रति अपनी आवाज को निर्भयता और दृढ़ता से उठाने का प्रयास किया है। धूमिल ने सर्वहारा वर्ग के प्रति मानवीय संवेदना तथा सदियों से हो रहे शोषण को अपनी कविताओं का विषय बनाया हैं। वह शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति के साथ अपनी वेदना को वाणी देने का प्रयास किया हैं। जनशक्ति को बढ़ाने के लिए अपनी कविता को आधार बनाया हैं। शोषित वर्ग, पूंजीवादी तथा सत्ताधारी वर्ग का विरोध किया हैं। हिंसा का विरोध करते हुए अहिंसा को मानवतावाद से सफलतापूर्वक जोड़ने की कोशिश करना चाहते हैं। इनकी कविता आम जनता को मानवीय मूल्यों की गहराई तक पहुंचती हैं और उन्हें स्थापित भी करती हैं। इनकी कविता समाज,व्यवस्था तंत्र और राजनीतिक पृष्ठभूमि को उजागर करती है। उनकी कविता आम आदमी के अनुभव को महसूस करती हैं, और उस परिस्थितियों की ज्वाला को आत्मसात भी करती हैं। वह समस्त जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त अपनी कविताओं के माध्यम किया हैं। उनकी कृति भारतीय जनतंत्र में स्वतंत्रता, न्यायपूर्णता,समानता, बंधुत्वता और धर्मनिरपेक्षता को काफी महत्व देने का प्रयास करती है। मूलरूप से स्वतंत्रता के पश्चात् समाज में पूंजिवादी व्यवस्था का विकास तथा जनसाधारण का शोषण के विरुद्ध की वाणी इस दौर के कविताओं में प्रकाशित होती हैं। उनकी कविताओं के माध्यम से जनता के आशा की अभिव्यक्ति को स्पष्ट रूप से पाठक तक पहुंचाया जा सकता हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि समकालीन कवियों की दृष्टि काफी व्यापक और सजग हैं। इनकी वैचारिक दृष्टि और भाषा सरल होने के बावजूद भी पाठक के हृदय स्थल को उद्वेलित करती है। धूमिल प्रगतिशील लेखन सम्मेलन से जुड़े थे तथा सभी जगह अपनी संलग्नता और तीक्ष्णता का परिचय दिया हैं। समकालीन हिंदी कवियों में रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, अरुण कमल, चंद्रकांत देवताले और राजेश जोशी का प्रमुख स्थान हैं। इन कवियों में मोहभंग, जनतंत्र, शोषण और आक्रोश के दौर में व्यवस्था के विरुद्ध आम आदमी की पीड़ा और यथार्थवादी भाव को व्यक्त किया हैं। |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/04/30 |
| How to Cite | चौबे, नेहा. (2026). धूमिल के काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोण. Shodh Sangam Patrika, 3(2), 1-6. |
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