| Article Title |
अनन्यता का विज्ञान : मानव सामर्थ्य एवं प्राकृतिक नियति का दार्शनिक अध्ययन |
| Author(s) | डॉ. अतुलकुमार भीखाभाई उनागर. |
| Country | India |
| Abstract |
शोध-संक्षेप (Abstract) : इस शोधपत्र में प्राचीन चिंतन के गूढ़ और शाश्वत दार्शनिक सिद्धांतों तथा वर्तमान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच के तात्त्विक अध्ययन के पश्चात मानव-जीवन में 'अनन्यता' के विज्ञान का संपूर्ण अवलोकन और विश्लेषण किया गया है। जगत का प्रत्येक छोटा-बड़ा घटक एक सुव्यवस्थित वैश्विक-अनुशासन (ऋत) और नियतिबद्ध कार्य-कारण संबंध की श्रृंखला से सुनियोजित रूप से संचालित है। इस सार्वभौमिक नियम के अंतर्गत प्रत्येक मानव का जीवन भी एक निश्चित वैयक्तिक स्वरूप, नैसर्गिक गुण-सामर्थ्य और प्रत्येक की भिन्न-भिन्न जैविक-मानसिक सीमाओं के एक निश्चित 'प्रकृति-संपुटन' के साथ जन्म लेता है। सांख्यदर्शन के पुरुषार्थ-प्रवृत्ति नियम, भगवद्गीता के स्वधर्म-निरूपण तथा आधुनिक विभेदक मनोविज्ञान के 'वैयक्तिक भिन्नता' के सिद्धांत से यह प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य की अंतर्निहित सिद्धियां/शक्तियां तथा मर्यादाएं ही उसके वास्तविक जीवन-कार्य, योगदान तथा कार्यक्षेत्र का निर्धारण करती हैं। इस शोध का मुख्य निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि अन्यों के बाह्य अनुकरण के स्थान पर अपनी सहज प्रकृतिदत्त अनन्यता की सच्ची पहचान और आत्मबोध ही मानवीय सामर्थ्य या सफलता का मूल स्रोत है, जिसके द्वारा स्व से वैश्विक कल्याण, सार्थक जीवन और नूतन महासर्जन संभव बनता है, इस सिद्धांत को समझने वाले प्रत्येक मानवजीवन का उद्धार निश्चित ही है। |
| Area | संस्कृत |
| Issue | Volume 3, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/06/10 |
| How to Cite | अतुलकुमार भीखाभाई उनागर (2026). अनन्यता का विज्ञान : मानव सामर्थ्य एवं प्राकृतिक नियति का दार्शनिक अध्ययन. Shodh Sangam Patrika, 3(2), 68–76. |
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