जैन दर्शन में शिक्षा की संकल्पना

Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 1 (January - March 2026)
Article Title

जैन दर्शन में शिक्षा की संकल्पना

Author(s) डा. अनिल कुमार.
Country
Abstract सारांश जैन दर्शन का प्रादुर्भाव अति प्राचीन है। वेद और उसके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के विरुद्ध तथा कर्मकाण्डों के विरुद्ध सामाजिक परिस्थितियों के फलस्वरूप इसका विकास हुआ। ब्राह्मण व्यवस्था से असंतोष के कारण आसानी से इस धर्म को लोगों ने स्वीकार कर लिया। जैन धर्म में चौबीस तीर्थकरों के द्वारा समय-समय पर जो त्याग तपस्या की बातें की गईं उन्होंने तत्कालीन समाज को ज्यादा प्रभावित किया। जैन दर्शन ने वैभव साम्राज्य को त्यागकर सुख की तलाश में भिक्षुक जीवन धारण कर विश्व शान्ति का उपदेश दिया और हिंसाग्रस्त समाज को बताया कि जीवन क्या है। परोपकार की भावना से मनुष्य को निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है। ऊँच-नीच की जो भावना समाज में व्याप्त थी उसका विरोध किया गया तथा जैन शिक्षा दर्शन द्वारा संसार को मुक्ति के मार्ग का उपदेश दिया गया।
Area शिक्षा शास्त्र
Issue Volume 2, Issue 3 (July - September 2025)
Published 13-09-2025
How to Cite कुमार, डा. अनिल. (2025). जैन दर्शन में शिक्षा की संकल्पना. Shodh Sangam Patrika, 2(3), 75-81.

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