| Article Title |
नाथ साहित्य का उद्भव, ऐतिहासिकता और वर्तमान |
| Author(s) | कृष्ण कुमार मुक्कड़, डॉ. अखिलेश चास्टा. |
| Country | India |
| Abstract |
नाथपंथ एक सामाजिक धार्मिक समन्वय संस्था का नाम है। नाथ पंथ के योगिया ने भारत के सामाजिक आर्थिक परिवर्तन में अद्वितीय भूमिका निभाई। नवीन जीवन मूल्यों के माध्यम से पूरे समाज को प्रभावित किया। नाथ पंथ के विषय पर विस्तृत चर्चा इस शोध ग्रंथ में हुई है। नागपंथ भारत की मध्ययुगीन साधना के प्रकाश स्तंभ के रूप में दिखाई पड़ता है। जिसमें लोक कल्याण की लौह प्रज्वलित होती है। नाथ पंथ गोरखनाथ की साहित्य और उनके योगतत्व के ईर्द-गिर्द घूमता है। नाथ पंथ के अनुसार गोरखनाथ सार्वदेशिक और सर्वकालिक है, जिसका प्रभाव संपूर्ण भारतीय समाज के साथ-साथ मध्य एशिया के विस्तृत भूभाग में व्याप्त है। इन भूभाग में नाथ पंथ की महंत-मठ परंपरा का भी अपना महत्व है। गुरु शिष्य परंपरा और योग दर्शन संपूर्ण विश्व की एक आध्यात्मिक चेतना का अमूल्य धरोहर है। नाथ पंथ के आविर्भाव के समय भारत में विघटन और विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ विकसित हो चुकी थी। लेकिन नाथ पंथ ने उसे शनै: शनै: समाप्त करते हुए भारत को एकता के सूत्र में बाँधा। भारत में व्याप्त सामाजिक विकृतियों का खंडन करते हुए आम जनता को अपने योगमार्ग से जोड़ा। नवनाथ और चौरासी सिद्ध भारतीय जीवन पद्धति के वाहक है। गोरखनाथ का नाथ पंथ आगे चलकर संप्रदाय की संकीर्ण मनोवृतियों में बदल गया। अतः नाथपंथ ने योग के माध्यम से तन मन और मनुष्य जन्म को साधने का एक अचूक निशाना दिया। नाथ साहित्य अपने समय के सामाजिक और धार्मिक अनाचारों के विरुद्ध एक मजबूत आवाज था, जिसने हठयोग को केंद्र में रखकर एक ऐसी साधना पद्धति प्रस्तुत की, जो परवर्ती हिंदी साहित्य की ज्ञानमार्गी शाखा के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुई, जिसकी उपादेयता और प्रासंगिकता युग-युगांतर तक रहेगी। |
| Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/12/29 |
| How to Cite | Shodh Sangam Patrika, 2(4), 147-151. |
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