भूमंडलीकरण और मनोज रूपड़ा के उपन्यासों में व्यक्त अकेलापन

Shodh Sangam Patrika

Shodh Sangam

Patrika

A National Peer-Reviewed & Refereed Quarterly Journal

  ISSN: 3049-0707 (Online)
ISSN: 3049-172X (Print)

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 1 (January - March 2026)
Article Title

भूमंडलीकरण और मनोज रूपड़ा के उपन्यासों में व्यक्त अकेलापन

Author(s) जितेन्द्र, डॉ. अंजन कुमार.
Country India
Abstract अकेलापन एक भावनात्मक एवं मानसिक स्थिति है। जिसमें व्यक्ति अपनों या अपने परिवेश के बीच स्वयं को अकेला महसूस करता है। अकेलापन से जूझ रहा व्यक्ति एक समय बाद घुटन एवं कुंठा का शिकार हो जाता हैl अकेलेपन की भावना से गुजर रहे व्यक्ति को जीवन निरर्थक लगता है। वह एकाकीपन में निरन्तर रिक्तता और उद्देश्यहीनता का अनुभव करता है। अकेलापन आधुनिक सभ्यता की देन है औद्योगिकीकरण और नगरीकरण के प्रभाव से इसका विकास हुआ है। अकेलेपन की अभिव्यक्ति स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य में अधिक दिखाई देती है। भूमंडलीकरण के बाद अकेलेपन की भावना निरंतर बढ़ती गयी है साथ ही इसकी स्थिति पहले से अधिक चिंताजनक हुई है। आज के समय में अकेलापन जीवन की एक प्रमुख समस्या बनती जा रही है। मनोज रूपड़ा ने अपने उपन्यासों में वर्तमान भूमंडलीकरण के संदर्भ में मनुष्य के अकेलेपन को बहुत गहराई के साथ चित्रित किया है। मनोज रूपड़ा के उपन्यास ‘प्रतिसंसार’ के आनंद का अकेलापन पूँजीवाद जीवन शैली के दुष्प्रभाव स्वरूप पारिवारिक विखंडन से ऊपजा अकेलापन है। इसी तरह ‘काले अध्याय’ उपन्यास के नायक के अकेलेपन में भूमंडलीकरण के कारण आदिवासी समुदाय का विखंडन एवं विस्थापन निहित है। इसी उपन्यास में कैप्टन दत्त के अकेलेपन के पीछे अतीत की हिंसक घटनाओं के साथ समकालीन पूँजीवादी व्यवस्था के अनिश्चित, अस्थिर और छद्म भरी प्रवृत्ति कारक है।
Area हिन्दी साहित्य
Issue Volume 3, Issue 1 (January - March 2026)
Published 2026/02/20
How to Cite जितेन्द्र, , एवं कुमार, अंजन. (2026). भूमंडलीकरण और मनोज रूपड़ा के उपन्यासों में व्यक्त अकेलापन. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 38-42.

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