| Paper Title | ‘छप्पर’ उपन्यास में रोगजार की समस्या |
| Author(s) | |
| Country | India |
| Abstract | सारांश रोज़गार समाज में एक गंभीर समस्या रही है विशेषकर दलित समाज भी इससे बहुत प्रभावित हुआ है। उनके पास अपना कोई भी उत्पादन का साधन नहीं रहा, इसी कारण वे रोज़गार के लिए दूसरों पर निर्भर रहे हैं। जय प्रकाश कर्दम द्वारा रचित छप्पर उपन्यास में सुक्खा और उसकी पत्नी रमिया साधारण माता-पिता की तरह अपने बच्चे चंदन के रोज़गार के लिए चिंतित हैं। इस उपन्यास में रोज़गार की समस्या एक महत्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक समस्या के रूप में उभर कर सामने आती है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने समाज के वंचित और श्रमिक वर्ग के जीवन-संघर्ष, गरीबी, बेरोज़गारी तथा आर्थिक असमानता का चित्रण किया है। रोज़गार के सीमित अवसरों के कारण गरीब वर्ग को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बेरोज़गारी के कारण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है तथा उसके परिवार की शिक्षा स्वास्थ्य और जीवन-स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उपन्यास में सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण जैसी समस्याएं भी रोज़गार के अवसरों को प्रभावित करती हैं। रोज़गार की कमी के कारण युवाओं में निराशा और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। इस प्रकार छप्पर उपन्यास रोज़गार की समस्या के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानता और शोषण को उजागर करता है तथा समान अवसरों, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर बल देता है। |
| Keywords | आर्थिक, अशिक्षित, पूंजीपतियों, बेलदारी, कमरतोड़. |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 3, Issue 4 (October - December 2026) |
| Published | 2026/10/29 |
| How to Cite | सुभाष चन्द्र (2026). ‘छप्पर’ उपन्यास में रोगजार की समस्या. Shodh Sangam Patrika, 3(4), 1–5. |
| License |
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