| Paper Title | भारतीय वाद्य-संगीत: सितार एवं बांसुरी में नवाचार और योगदान |
| Author(s) | कु. श्रेया सुचेता पटवर्धन, प्रो. डॉ. संगीता बापट. |
| Country | India |
| Abstract | हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वाद्य-संगीत का विकास केवल परंपरा का परिणाम नहीं, बल्कि महान कलाकारों की सृजनशील दृष्टि और तकनीकी प्रयोगों का प्रतिफल है। प्रस्तुत लेख में सितार और बांसुरी के विकास का अध्ययन करते हुए पं. रवि शंकर तथा पं. पन्नालाल घोष के योगदान को केंद्र में रखा गया है। सितार की संरचना, तार-व्यवस्था और ध्वनि-विस्तार में पं. रवि शंकर द्वारा किए गए परिवर्तन तथा दो तुंबों वाली सितार के प्रयोग का विश्लेषण किया गया है। साथ ही बांसुरी को लोकवाद्य से शास्त्रीय वाद्य के रूप में स्थापित करने में पं. पन्नालाल घोष द्वारा किए गए रचनात्मक और वादनात्मक परिवर्तनों, विशेष रूप से तीव्र मध्यम हेतु जोड़े गए सातवें छिद्र के महत्व को स्पष्ट किया गया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि इन कलाकारों के योगदान से भारतीय वाद्य-संगीत को नई दिशा और वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। |
| Subject Area | संगीत |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (October - December 2025) |
| Published | 2025/12/30 |
| How to Cite | कु. श्रेया सुचेता पटवर्धन एवं संगीता बापट (2025). भारतीय वाद्य-संगीत: सितार एवं बांसुरी में नवाचार और योगदान. Shodh Sangam Patrika, 2(4), 157–162. |
| License |
Copyright © 2025 The Author(s). This work is licensed under a
Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0). |
View / Download PDF File