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Author(s):
प्रो. अर्चना दुबे.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-8 |
अवतारवाद और कर्मचक्र
Abstract
संसार के अलग- अलग धर्मों में अवतारवाद अत्यंत आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी अवतार मान्य हैं विशेष रूप से भारतवर्ष में हिंदू धर्म में अवतारवाद की विशेष प्रतिष्ठा है जैसाकि हिंदू धर्म में माना जाता है कि धर्म के स्थान पर अधर्म की प्रबलता होने पर भगवान का अवतार होता है सज्जनों के उद्धार और दुर्जनों के विनाश, अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान के अवतार धारण करने का प्रयोजन गीता के इस श्लोक में स्पष्ट होता है-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।।
वैष्णव धर्म में अवतार का तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। कर्मचक्र की बात करें तो विष्णु के दशावतारों में दाशरथि राम और श्रीकृष्ण के अवतार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक ने कर्मचक्र को सिद्ध किया जिसका उल्लेख रामायण की उस कहानी में प्राप्त होता है जिसमें राजा दशरथ के बाण से श्रवण कुमार की मृत्यु होने पर श्रवण कुमार के माता-पिता के राजा दशरथ को दिए गए पुत्र वियोग के श्राप से श्री राम को वनवास मिला द्वितीय ने कर्म की मीमांसा कर कर्म का उपदेश दिया-
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।
दाशरथि राम अवतार होकर भी लोक के अधिक निकट हैं। उनका अपने युग में अवतार लेना लोक हित के प्रयोजन से ही था। त्रेता युग में जब राक्षस जाति के अत्याचारों से साधु-संत त्रस्त थे समस्त पृथ्वी आतंकित होकर काँप रही थी असत प्रवृत्तियों का भण्डार रावण और उसकी सेना अत्याचार एवं प्रजापीड़न करती है ऐसे में राम उच्चतम आदर्श के प्रतीक बन एक ओर अनाचारी, अत्याचारी राक्षस जाति का नाश करते हैं तो दूसरी ओर लोक के समक्ष धैर्य,शील, साहस, मर्यादा, त्याग, सत्य, न्याय, कर्तव्य पालन और समता का आदर्श भी स्थापित करते हैं। मानवता का पोषण करते हुए परब्रह्म होकर भी वे मानव अधिक हैं, मानव को धैर्यपूर्वक सुख-दुख के प्रति समान भाव रखते हुए जीवन यापन का मार्ग अपनाने के हेतु से वे स्वयं ऐसा जीवन धारण करते हैं जिसमें दु:ख हैं वियोग है, कठिनाइयाँ हैं, निराशा है, आँसू हैं, संघर्ष हैं, ताप (दैहिक दैविक भौतिक) हैं और इन तापों का विनाश करके एक समृद्धशाली, सर्वसुख सम्पन्न, सर्वजनोपयोगी, भयविहीन आदर्श “रामराज्य” की स्थापना का संकल्प भी है। वे अपने जीवन के माध्यम से कर्म योग की प्रेरणा देते हैं। साक्षात नारायण जिनके बारे में शिवजी कहते हैं-
केहि बिधि दरसन होइ गुप्तरुप अवतरेउ प्रभु गए जान सब कोइ।।
ऐसे नारायण के अवतार दाशरथि राम के जीवन को जानकर कर्मचक्र और अवतार के सहसंबंध को जाना जा सकता है। कर्मचक्र का सिद्धान्त यह बताता है कि हमारे कर्म हमारे वर्तमान जीवन और भावी जीवन के अनुभवों का निर्धारण करते हैं, कर्म चक्र में क्योंकि क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम कार्य करता है और हमारे द्वारा किए गए हर कार्य का एक परिणाम होता है जो हमारे अगले जीवन या अगले अनुभव को प्रभावित करते हैं। राम का अवतरण दानवों के विनाशार्थ एवं सज्जनों के पालनार्थ हुआ –
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।।
राम का जन्म असत् पर सत् की विजय और मानवता की रक्षा के द्वारा मानव जाति में इस अनुभव को स्थापित करता है कि बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित है किन्तु ‘राम’ के ‘राम’ बनने में गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करना, शिक्षा के समस्त कौशल प्राप्त करना जिससे दैत्यों का नाश कर प्रजा की रक्षा कर सकें, पिता के वचन से राज्य को त्यागकर तपस्वी का वेश धारण करके भीषण वन में चले जाना इस अनुभव को जीवन में लाता है कि पिता का स्थान सर्वोपरि है, उनके वचन का निर्वाह करना पुत्र का धर्म है इस धर्म का परिणाम है- दैत्यों का नाश। यदि राम वन नहीं जाते तो रावण (अधर्म) का संहार नहीं होता –
पिता बचन तजि राज उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।
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Author(s):
डॉ० मलयज गंगवार.
Country:
India
Research Area:
सामाजिक अध्ययन
Page No:
9-16 |
शून्य-अपशिष्ट फैशन : एक सतत परिप्रेक्ष्य
Abstract
वर्तमान समय में फैशन उद्योग न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बल्कि यह पर्यावरणीय संकटों का भी एक बड़ा स्रोत बन चुका है। वस्त्रों के उत्पादन, रँगाई-छपाई, परिधान-निर्माण और अंततः उनके परित्याग तक की प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में जल, ऊर्जा, रसायन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों की खपत होती है। जिसके परिणामस्वरूप जल-स्रोतों के प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि तथा अपशिष्ट-प्रबंधन की गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
इन पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु 'शून्य-अपशिष्ट' (Zero-Waste) फैशन की अवधारणा एक सशक्त विकल्प के रूप में उभर रही है। इस पद्धति में ऐसी डिज़ाइन और निर्माण तकनीकों का समावेश होता है, जिनसे वस्त्र का एक भी टुकड़ा व्यर्थ नहीं होता है। प्रस्तुत शोध-पत्र शून्य-अपशिष्ट फैशन की मूल अवधारणा, इसके अंतर्गत उपयोग में लाई जाने वाली तकनीकों, भारत की पारम्परिक शिल्प-कलाओं में इसके अनुप्रयोग, इससे मिलने वाले सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभ तथा इसे अपनाने में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करता है। साथ ही, इसमें शून्य-अपशिष्ट फैशन की संभावनाओं को लेकर भविष्य की दिशा को भी रेखांकित किया गया है।
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Author(s):
सुशील महतो.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
17-20 |
“ढलती सांझ का सूरज” में किसान जीवन की त्रासदी
Abstract
इसमें किसानों की त्रासदी की विभिन्न घटनाओं सहित उनकी समस्या और समाधान दिखलाई पड़ता है। एक तरफ समाज और सरकार की नीतियों के कारण किसान वर्ग आज आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध करने को मजबूर है। मानो सरकार की यह नीति रह गई हो बाजार आजाद और किसान बर्बाद। वहीं दूसरी तरफ अविनाश के माध्यम से यह देखने को मिलता है कि किस प्रकार पश्चाताप के आग में जलकर अविनाश किसानों की मदद करने को तत्पर है। वह किसानों की समस्या को किसानों के साथ रहकर देखता है और उसे समाधान करने का पूरा प्रयास करता है। वास्तव में यदि हम किसानों की बुनियादी समस्या का समाधान करें तो किसान भी मुख्य धारा में जुड़ सकते हैं साथ ही उसकी आमदनी भी बढ़ सकती है, जो हमें किसानों की नकदी फसल सहित विभिन्न फसल उगने में रुचि एवं उद्यमी महिलाओं द्वारा बनाए गए जैविक खाद की बढ़ती मांग जो महिलाओं की आर्थिक शक्ति को मजबूत करती हो। व्यक्ति यदि किसी चीज को ठान ले तो कोई भी काम असंभव नहीं हो सकता,जो हमें अविनाश के द्वारा विभिन्न गांव में किए हुए काम में दिखलाई पड़ता है। परंतु विडंबना यह भी है कि सरकार की उदासीनता एवं बाजारवाद के कारण किसानों के भीतर सिर्फ और सिर्फ डूबते हुए सूर्य की उदासी छाई रहती है।
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Author(s):
डॉ. अर्चना दास.
Country:
India
Research Area:
ललित कला
Page No:
21-27 |
बंगाल में धार्मिक सामाजिक अनुष्ठानों में मृण पात्रों व उत्पादों का पारंपरिक महत्व
Abstract
प्रस्तुत लेख में बंगाल में (हिंदू धर्म में) धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठानों में उपयोग किये जाने वाले मिट्टी के पात्रों और अन्य उत्पादों के निर्माण के माध्यम से हम प्राचीन भारतीय दर्शन और धार्मिक मान्यताओं का विश्लेषण करेंगे। मृण पात्रों के आकारों की अभूतपूर्व संकल्पना और इन्हें निर्मित करने की विभिन्न तकनीकें हमें सिंधु घाटी से प्राप्त होती हैं जो उत्तरोत्तर वैदिक काल से होते हुए समग्र प्राचीन भारतीय इतिहास (गुप्त काल तक) आरोपित होती हैं। लेख में लोक परम्पराओं पर आधारित उन टेरा कोटा (पकी हुई मिट्टी) निर्मित पात्रों और अन्य शुभ माने जाने वाले उत्पादों का परिचय प्रस्तुत किया गया है, जिनका उपयोग प्रचलित रूप से जन सामान्य के मध्य होता है। इसके अतिरिक्त ये उत्पाद हस्तशिल्प की श्रेणी में भी गणमान्य होते हैं तथा वर्तमान समय में भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्वीकार्य हैं।
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Author(s):
आचार्य राहुल पन्त, डॉ. नीरज कुमार जोशी.
Country:
India
Research Area:
संस्कृत
Page No:
28-35 |
भारतीय काव्यविद्या का स्वरूप एवं प्रतिपाद्य
Abstract
मानव जीवन कि सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्ति विद्या (ज्ञान) को कहा जाता है| विद्या व्यक्ति के जीवन को प्रकाशमय बनाने में सहायक सिद्ध होती है| विद्या व्यक्ति के भीतर सोचने समझने कि क्षमता विकसित करती है| विद्या व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार को संवारती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति आत्मनिर्भर और विवेकशील बनता है|
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः|
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति||
जिन मनुष्यों के पास विद्या नही है, तप जीवन में नही है, दान देने की इच्छा नही है, न ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा है, न ही उनके जीवन में सदाचार है और न ही धर्म है, इस प्रकार के मनुष्य पृथ्वी पर भारभूत मात्र हैं और मनुष्य के रूप में वे पशु के समान व्यर्थ विचरण कर रहे हैं|
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्|
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्||
विद्या से मनुष्य में विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन की प्राप्ति होती है, धन के द्वारा वह धर्म-कर्म करता है, और धर्म-कर्म से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है| विद्या के द्वारा व्यक्ति को रोजगार की भी प्राप्ति होती है, जिससे वह धनार्जन करके अपने जीवन का निर्वाह करता है| अतः विद्याध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है| शस्त्रविद्या एवं शास्त्रविद्या दोनों का आदर करना चाहिए| परन्तु शस्त्रविद्या बुढापे में ‘पुरुषार्थ’ न होने से काम नही आती, बल्कि उपहास कराती है| लेकिन शास्त्रविद्या सर्वदा (सब काल में) आदर प्रदान कराती है| विद्या सब काल में व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त करवाती है| विद्वान पुरुष को समाज आदर और सम्मान कि दृष्टि से देखता है|
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Author(s):
शुभम थपलियाल.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
36-41 |
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबंधों में लोकतांत्रिक मूल्य
Abstract
हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य साहित्य के तीक्ष्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया। यह शोध-पत्र उनके निबंधों में लोकतंत्र के मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता, न्याय, सहभागिता, जवाबदेही, पारदर्शिता, धर्मनिरपेक्षता एवं विधि का शासन—का विश्लेषण करता है। परसाई का व्यंग्य मार्क्सवादी प्रभावित होते हुए भी विचारधाराओं से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार, शोषण और असमानता पर प्रहार करता है। उनका लेखन नकारात्मक नहीं, अपितु सुधारवादी है; विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, यह विद्रूपताओं से जूझकर सकारात्मकता अर्जित करता है।
‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ में समानता की विडंबना ठंड में ठिठुरते गणतंत्र के रूप में उभरती है। ‘सड़े आलू का विद्रोह’ स्वतंत्रता को खोखले बुद्धिजीवियों की निष्क्रियता दिखाता है। न्याय ‘पांडवों की अख्यायिका’ में धन के आगे सत्य की हार बनता है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ सहभागिता की जगह अविश्वास को चित्रित करता है। ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ जवाबदेही की कमी को भ्रष्ट पुलिस तंत्र से जोड़ता है। ‘खेती’ में पारदर्शिता कागजी योजनाओं में दबकर रह जाती है। ‘खुदा से लड़ाई की सज़ा’ धर्मनिरपेक्षता पर धर्म-राजनीति के मिश्रण का खतरा उजागर करता है। ‘भ्रष्टाचार नियोजन आंदोलन’ विधि के शासन को रिश्वतखोर व्यवस्था में बदलता दिखाता है।
परसाई व्यंग्य को सामाजिक कर्म मानते थे, जो हास्य-करुणा से समाज को आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है। उनका लेखन नेहरू युग से इमरजेंसी तक के संदर्भों में लोकतंत्र के अंतर्विरोधों को आईना दिखाता है। निष्कर्षतः, परसाई सतर्कता और सक्रियता की माँग करते हैं, ताकि लोकतंत्र आदर्श से यथार्थ बने। उनका योगदान आज भी प्रासंगिक है।
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Author(s):
डॉ. मुकेश कुमार.
Country:
India
Research Area:
पत्रकारिता
Page No:
42-49 |
महात्मा गांधी की पत्रकारिता के प्रतिमान और प्रासंगिकता: ऐतिहासिक अध्ययन
Abstract
महात्मा गांधी शब्दों की शक्ति में दृढ़ विश्वास रखते थे और पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य सेवा को मानते थे. वे पत्रकारिता के माध्यम से देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ने के पक्षधर थे. उनका ध्येय पत्रकारिता के माध्यम से संपूर्ण समाज को जोड़ना था. महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को विशिष्ट स्वरूप दिया. इन्होने नैतिक आचार संहिता की रचना करके भारतीय पत्रकारिता को युग सापेक्ष बनाकर मूलभूत प्रतिमानों और मूल्यों से जोड़कर मानवीय और नैतिक बनाने का प्रयास किया. परंतु, क्या वर्तमान भारतीय पत्रकारिता महात्मा गांधी के नैतिक आचार संहिता के नियमों का पालन कर रही है? महात्मा गांधी ने इंडियन ओपेनियन, नवजीवन, हरिजन, यंग इंडिया के माध्यम से जिस “पत्रकारिता दर्शन” को विकसित किया था वह समकालीन दौर में किस तरह मीडिया/प्रेस को प्रभावित कर रहा है इसका विश्लेषण उदाहरणों द्वारा इस शोध पत्र में किया गया है. इस शोध पत्र में ऐतिहासिक शोध प्रविधि का प्रयोग किया गया है. इसमें प्राथमिक और द्वितीयक सोतों की सहायता ली गई है. शोध पत्र का सैद्धांतिक आधार एजेंडा सेटिंग सिद्धांत है.
बीज शब्द : गांधी की पत्रकारिता और प्रतिमान, इंडियन ओपेनियन, नवजीवन, हरिजन, यंग इंडिया.
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Author(s):
हिमांशु मीणा.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
50-55 |
9वीं–16वीं सदी में मेवाड़ की मुद्रा प्रणाली का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
Abstract
9वीं से 16वीं सदी के बीच मेवाड़ की आर्थिक संरचना में मुद्रा प्रणाली निर्णायक भूमिका निभाती रही। इस अवधि में मुद्रा केवल लेन-देन का साधन नहीं थी, बल्कि राजनीतिक अधिकार, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक संपर्कों को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में कार्य करती थी। गहलोत और सिसोदिया शासकों के समय में टकसालों की गतिविधियाँ अधिक संगठित हुईं और सिक्कों के वजन, धातु तथा प्रतीकों में अपेक्षाकृत स्थिरता दिखाई देती है। इस स्थिरता का सीधा प्रभाव व्यापार मार्गों, बाजारों और उत्पादन क्षेत्रों पर पड़ा। चांदी और तांबे के सिक्कों का अलग-अलग स्तरों पर उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था को लचीला बनाता था और इससे कृषि, शिल्प, पशुपालन तथा स्थानीय विनिर्माण क्षेत्रों में गतिविधि बढ़ी।मुद्रा के चलन ने सामाजिक ढांचे को भी प्रभावित किया। भुगतान प्रणाली में धीरे-धीरे मुद्रा की स्वीकृति ने श्रम, कर और पेशागत भूमिकाओं में स्पष्टता उत्पन्न की। सिक्कों पर अंकित धार्मिक प्रतीक और राजचिह्न उस समय की सांस्कृतिक स्मृति और राजनीतिक वैधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस लेख में मूल स्रोतों, इतिहासकारों के अध्ययनों और क्षेत्रीय संदर्भों के आधार पर मेवाड़ की मुद्रा प्रणाली के विकास, उसके आर्थिक प्रभावों और उसके सामाजिक आयामों का विश्लेषण किया गया है, जिससे मध्यकालीन राजस्थान की आर्थिक गतिविधियों की अंतर्निहित संरचना को समझा जा सके।
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Author(s):
नरेन्द्र कुमार, निरुपमा हर्षवर्धन.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
56-61 |
ऋतुराज के काव्य में स्त्री की सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्रण
Abstract
समकालीन हिंदी कविता समाज के बदलते परिवेश और जीवन-संघर्षों का सशक्त दर्पण है। विशेषतः जनवादी कविता ने साहित्य को जनजीवन के ठोस यथार्थ से जोड़ते हुए समाज के उपेक्षित, दलित, श्रमिक तथा स्त्री वर्ग की वास्तविक परिस्थितियों को केंद्र में रखा है। जनवादी कवियों का मानना रहा है कि कविता का उद्देश्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाना है। इसी दृष्टि से उन्होंने स्त्री के अदृश्य श्रम, दोहरे शोषण और उसके संघर्षशील अस्तित्व को आवाज़ दी है।जनवादी कविता स्त्री को किसी देवी, प्रतीक या करुणा-मूर्ति के रूप में नहीं देखती, बल्कि एक जीवित, संघर्षरत, श्रमशील और चेतन मानव के रूप में प्रस्तुत करती है। समकालीन स्त्री जहाँ आर्थिक शोषण और पितृसत्ता के दबावों से जूझती है, वहीं अपनी अस्मिता, श्रम और आत्मबल के आधार पर प्रतिरोध भी करती है।इसी परंपरा में ऋतुराज की कविताएँ जनवादी चेतना का महत्वपूर्ण स्वर हैं। वे स्त्री को जीवन के कठोर यथार्थ के बीच भी हँसते, संघर्ष करते और श्रम से सुगंधित जीवन रचते देखते हैं। उनकी “गरीब स्त्री”, “कन्यादान”, “मास्टरनी”, “माँ का दूध” जैसी कविताएँ स्त्री के भीतर दबे दर्द, श्रम, संवेदना और जिजीविषा को अत्यंत गहनता से व्यक्त करती हैं। ऋतुराज की काव्य दृष्टि में स्त्री कोई मिथकीय छवि नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली सृजनशील शक्ति है।इस प्रकार समकालीन जनवादी कविता स्त्री के वास्तविक जीवन-संघर्षों को उजागर कर समाज के लिए चेतना का दस्तावेज़ बनती है। यह बताती है कि स्त्री की अस्मिता, स्वाधीनता और गरिमा के बिना जनवाद अपूर्ण है।
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Author(s):
डॉ. प्रमोद भगवान पडवल.
Country:
India
Research Area:
सामाजिक अध्ययन
Page No:
62-65 |
द्रष्टा समाजसुधारक : कन्डुकुरी वीरेशलिंगम और महात्मा जोतीराव फुले
Abstract
सारांश
परकीय सत्ता की दासता से मुक्ति पाने के लिए आजादी के संग्राम में शामिल नेताओं का जिस तरह से योगदान रहा है उसे जनता कभी भी भूल नहीं सकती I लेकिन हमें यह बिलकुल नहीं भुलना चाहिये की समाज सुधारकों ने भी स्वस्थ समाज निर्माण के लिए अपार मेहनत की है I आजादी के सैनिकों की लड़ाई सीधे विदेशी ताकद के खिलाफ थी इसलिए उनको भरपूर सहानुभूति मिली I किन्तु समाज सुधारकों का संघर्ष अपने ही देश के नागरिकों के साथ था इसलिए उन्हें न सहानुभूति मिली न सहयोग I आज हम आजाद देश के नागरिक है I यानी एक लड़ाई की समाप्ति हो चुकी है I परन्तु स्वराज्य का सुराज्य निर्माण करने का काफी कार्य बाकी है I ऐसे में हम लोगों को समाज सुधारकों के कार्यों का स्मरण कर उनके बतायें रास्ते पर चलना अनिवार्य हो गया है I नयी पीढ़ी को समाज सुधारकों की भूमिका की, दृष्टिकोन की और कार्य पद्धति की जानकारी अवश्य होनी चाहिए I इसी उद्देश से प्रस्तुत लेख में कन्डुकुरी वीरेशलिंगम और महात्मा फुले के कार्यों का परिचय करवाया है I
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Author(s):
प्रो. सुकर्मवती देवी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
66-72 |
संत नितानंद के काव्य में औदात्त्य की अभिव्यंजना
Abstract
संत नितानंद जी ने अपनी वाणी ‘सत्य- सिद्धांत- प्रकाश’ के माध्यम से संत साहित्य व समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। उनका सम्पूर्ण साहित्य मानव - मूल्यों पर केंद्रित है। उनकी वाणी मानव - प्रेम से लेकर ईश- प्रेम तक सामाजिक जीवन के उदात्त विचारों के समृद्ध भंडार को संजोए हुए है। तत्कालीन समय में वर्ग वैषम्य और जातिभेद अपनी सीमा पार कर रहे थे। उन्होंने एक सजग प्रहरी की तरह वर्णाश्रम व्यवस्था, जातिगत संकीर्णता, सांप्रदायिक भेदभाव, मूर्तिपूजा, बाह्याडम्बरों,पाखंडों व विषय - विकारों आदि पर जमकर प्रहार करते हुए अंत:करण की शुद्धता पर बल दिया। परम तोष परमात्मा के प्रति प्रणय- भाव की अनुभूति के साथ उन्होंने अनेक रहस्यानुभूतियों की अभिव्यंजना की है। बह्म, जीव, जगत व माया के प्रति उन्होंने जिन दार्शनिक विचारों को अभिव्यक्त किया है, वे अत्यंत उदात्त एवं उत्कृष्ट हैं। इन्होंने दर्शन, धर्म एवं समाज में व्याप्त कुरीतियों का खंडन कर लोगों को सत्कर्म करने के लिए प्रेरित किया जो तत्कालीन समाज के लिए महान संदेश था और आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उनके काव्य में सत्य, अहिंसा, करूणा, समानता व स्वतंत्रता आदि शाश्वत मूल्यों की स्थापना की गई है जो सामाजिक जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। आचार और विचार के शील, क्षमा, सहिष्णुता निर्वैर आदि भावों की गहन व्याख्या करने में उनकी वाणी बेजोड़ है। उनके काव्य में विचार, भाव एवं शैली सभी दृष्टियों से औदात्त्य का मणिकांचन संयोग हुआ है।
मुख्य शब्द : उदात्त, मानव-मूल्य, दार्शनिक, भेदभाव, रहस्यानुभूति, संकीर्णता।
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Author(s):
मुकेश कुमार.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
73-81 |
राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की कविता में सामाजिक सरोकार
Abstract
राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ का जन्म हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिला के बैजनाथ के निकट जण्डपुर गाँव में सन् 1975 ई. को हुआ है। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ के अभी तक तीन कविता-संग्रह प्रकाशित है, जिनके नाम है− गूलर का फूल (2008), ज़मीन पर होने की ख़ुशी (2020) और प्रेम में होना (2024)। कविता आत्मालाप नहीं, बल्कि सामाजिक-संलाप है। कविता के लिए अनुभूति आवश्यक होती है, इसलिए कविता संवेग तत्त्व से निर्मित होती है, न की सैद्धांतिक परिमाप पर आधारित होती है। कविता का लक्ष्य ही सामाजिक सरोकार से निर्मित होता है और सरोकार की सामाजिकता से अंतर्निहित होता है। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ की कविता की संवेदना का मूलाधार समय-संवाद और सामाजिक-सरोकार है। सरोकार की सामाजिकता मूलतः ग्रामीण एवं लोक पक्षवादी संवेग से संपृक्त है, जहाँ प्रेम, प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितिकी का क्षरित मूल्य विद्यमान है। राजीव कुमार ‘त्रिगर्ती’ हिमाचल का सबसे अधिक अवप्राक्कलन कवि हैं, इसलिए इनकी कविता की संवेदना का संप्रेषण बोध शोधित-समवेक्षित नहीं है।
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Author(s):
डॉ. प्रियंका कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
82-86 |
‘कजरी‘ का लोक सौन्दर्य
Abstract
‘कजरी‘ एक ऐसी लोक गायन विधा है जिसके श्रवण से मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित हो उठता है, तन-मन थिरकने को बाध्य हो जाता है। वर्षा-ऋतु का सर्वाधिक प्रचलित गीत है कजरी। चहूँ ओर हरियाली ही हरियाली देखकर मन-मयूर इन कजरी गीतों के साथ नृत्य कर झूमने को विवष हो उठता है। इन कजरी-गीतों का लोक-साहित्य और उसकी लोक रसयुक्त धुनें अन्तर्मन को भरपूर आनंदित करते हैं। इसके साहित्य में क्षेत्रिय बोलियों का सुन्दर समावेष होता है जो गीतों को कोमलता प्रदान करते हैं तो इसकी धुनों में गीतों में प्रयुक्त बोलियों की सुगंध बसी होती है। इन्हें सुनने के बाद कोई भी आनंदित हुए बिना नहीं रह सकता। वर्षा के आनन्द से अभिभूत साहित्य के साथ नायक-नायिका के श्रृंगार-वर्णन के अतिरिक्त भगवान षंकर की अराधना एवं भक्तिपरक साहित्य भी खूब सुनने को मिलता है। ऐसी कजरियाँ गायन की उपषास्त्रीय और लोक, दोनों षैलियों में पायी जाती हैं।
कजरी गायन की परम्परा भारत में अति प्राचीन समय से ही चली आ रही है। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण देष है। जीवन के समस्त उपादानों की भाँति मृदु मधुर गीतों का गान भी यहाँ के लोगों के दैनिक जीवन का प्रमुख अंग है। प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में लोकगीतों का बीज प्राप्त होता है। प्राचीन साहित्य में जिन गाथाओं का उल्लेख है, उन्हें लोक गीतों का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। अतः प्राचीनकाल से ही लोकसंगीत की प्रथा भारत में विद्यमान है।
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Author(s):
डॉ. रेखा कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
87-90 |
संस्कृति की धरोहर के परिप्रेक्ष्य में संगीत के विविध रूप
Abstract
संगीत का संबंध हमारे अतीत काल से चला आ रहा है। प्रारम्भ में ईश्वर की स्तुति करने के लिए गायन किया जाता था। आज इसने जगत में विशेष महत्व प्राप्त कर लिया है। संगीत का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। रामायण, महाभारत इत्यादि काल से ही संगीत का अपना विशिष्ट महत्व रहा है। कृष्ण और गोपिकाओं की रास-लीलाओं का दृश्य अत्यंत मनोरंजक एवं भावपूर्ण है। संगीत का गायन किसी न किसी उद्देश्य को केंद्र में रखकर किया जाता रहा है।अजंता एवं एलोरा की गुफाओं में आज भी संगीत की प्रासंगिकता के प्रमाण दिखाई देते हैं। अमीर खुसरो भक्ति काल के एक समृद्ध व्याख्याता थे। श्लोकों का गायन भी आज समृद्ध परंपरा के रूप में विद्यमान है। भारतीय साहित्य अपनी लोक-संस्कृति एवं परंपराओं के लिए विश्वविख्यात है। साहित्य के आदिकाल, भक्तिकाल तथा आधुनिक काल—तीनों में संगीत ने समाज को गहराई से प्रभावित किया है।भारत में जाति-भेद से ऊपर उठकर संगीत को महत्व दिया गया है। साहित्य इससे समृद्ध हुआ है। यहाँ होली, ईद आदि सभी पर्वों में संगीत को विशेष स्थान प्राप्त है। आज भी संगीत के माध्यम से अनेक मानसिक रोगों को दूर करने का कार्य किया जाता है, जिससे मनुष्य ही नहीं, पशु भी प्रभावित होते हैं। मीराबाई, सूरदास, कबीर, तुलसीदास आदि संत-कवियों ने अपने काव्य एवं संगीत के माध्यम से साहित्य को समृद्ध किया। जिन ग्रंथों ने पूरे जन-मानस को प्रभावित किया है, उनकी प्रासंगिकता भविष्य में भी बनी हुई है, जिससे जन-मानस निरंतर गतिशील बना हुआ है।
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Author(s):
सिद्धार्थ सिंह.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
91-95 |
कथाकार अखिलेश की चर्चित कहानियों में स्त्री संवेदना:एक विश्लेषण
Abstract
समकालीन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कथाकार अखिलेश अत्यंत प्रमुखता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। वर्तमान समाज की विडंबनात्मक स्थिति एवं मानवीय संवेदना का चित्रण उन्होंने अत्यंत प्रमुखता से अपने साहित्य में किया है। उनकी कहानियाँ अत्यंत गहरे स्तर पर वर्तमान मनुष्य की मन:स्थिति का विश्लेषण करती हैं। स्त्री सदैव से अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती रही है। अखिलेश की कहानियों की स्त्रियाँ भी इससे अलग नहीं हैं। इनकी कहानियों की स्त्रियाँ जीवन और आत्मविश्वास से परिपूर्ण अपनी अस्मिता को लेकर संघर्ष करती दिखाई देती हैं। अखिलेश की कहानियों की स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक समाज के मानदंडों के बीच अपने अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों के लिए संघर्ष करती दिखाई देती हैं। अखिलेश स्त्री को सहानुभूति का पात्र ना बनाकर उसे साधारण मनुष्य के रूप में समाज एवं परम्परागत बंधनों से जूझता हुआ दिखाते हैं। यह शोध पत्र अखिलेश की कहानियों अंधेरा, अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल, शापग्रस्त, श्रृंखला, जलडमरूमध्य, हाकिम कथा,, यक्षगान जैसी कहानियों का विवेचन करता है।
इस शोध पत्र का उद्देश्य अखिलेश की कहानियों में निहित स्त्री के सामाजिक,मानसिक संघर्ष व उसकी संवेदना का विश्लेषण करना है।
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Author(s):
सत्यम यादव.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
96-102 |
प्राचीन भारत में आर्थिक संगठन
Abstract
प्राचीन काल में आर्थिक संगठनों ने एक तरफ आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति की, तो दूसरी ओर व्यक्तिगत श्रेणियों तथा निकायों को सहकारिता की भावना सिखाई। इन संघों के कारण उत्पादन पर नियंत्रण रहा, वस्तुओं का मूल्य भी स्थिर रहे। यद्यपि आर्थिक संघ अपने संगठन तथा कार्य प्रणाली में स्वतंत्र थे, तथापि वे राज्य की राजनैतिक सत्ता पर अधिक दबाव डालने में असमर्थ थे। प्राचीन भारत में ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है जब आर्थिक संगठनों ने राज्य को चुनौती दी हो। राज्य और समाज की अर्थव्यवस्था में भी आर्थिक श्रेणियाँ सहायता देती थी तथा नये व्यवसायियों को भी यथा सम्भव सहायता देती थी। राज्य अथवा समाज के आर्थिक हितों पर आघात पहुँचाने की सम्भावना पर ही राज्य श्रेणियों के कार्य में हस्तक्षेप करता था अन्यथा राज्य श्रेणियों के स्वायत्त अधिकारों का सम्मान करता था।
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Author(s):
डॉ. राजाराम अग्रवाल, प्रो. (डॉ.) गोविन्द सहाय शुक्ला.
Country:
India
Research Area:
आयुर्वेद
Page No:
103-112 |
शाड्.र्गधर संहिता मध्यमखण्ड का समीक्षात्मक विवेचन
Abstract
विश्व की भौतिक उपलब्धियों की आधारशिला निरन्तर अनुसंधान है, जिसमें वाङ्मयात्मक अनुसंधान का विशेष महत्व है। लघुत्रयी में शाङ्र्गधरसंहिता का समावेश किया जाता है। शाङ्र्गधरसंहिता के मध्यम खण्ड में सर्वप्रथम भैषज्य निर्माण प्रक्रिया से सम्बन्धित परिभाषा-प्रकरण सहित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। इसी कारणवश शाङ्र्गधरसंहिता भैषज्य कल्पना के आधार-स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित है। इस लेख का मुख्य उद्देश्य मध्यम खण्ड में वर्णित दस अध्यायों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विवेचन करना तथा उनमें वर्णित विभिन्न कल्पनाओं के वैशिष्ट्य का प्रतिपादन करते हुए उनका समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।
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Author(s):
अनन्त श्रीवास्तव, डॉ० अनुपमा सिंह.
Country:
India
Research Area:
भूगोल
Page No:
113-122 |
महाराजगंज जनपद में पुरुष और महिला साक्षरता का भौगोलिक दृष्टिकोण से तुलनात्मक विश्लेषण
Abstract
यह अध्ययन उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में पुरुष और महिला साक्षरता दर के तुलनात्मक भौगोलिक विश्लेषण पर केंद्रित है। उत्तर प्रदेश के पूर्वोत्तर भाग में एक प्रमुख जिला, महाराजगंज, अनूठी सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक विशेषताओं को प्रदर्शित करता है जो साक्षरता की प्रवृत्ति को प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य विकास खंडों में साक्षरता के भौगोलिक वितरण पर विशेष ध्यान देने के साथ पुरुषों और महिलाओं के बीच साक्षरता दर में अंतर की जांच करना है। अध्ययन में 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया गया है, जिसमें पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए साक्षरता दर के साथ-साथ जिले के भीतर प्रत्येक विकास खंड के लिए समग्र साक्षरता दर शामिल है। निष्कर्ष साक्षरता दर में एक महत्वपूर्ण लिंग अंतर को उजागर करते हैं, जिसमें पुरुष आम तौर पर महिलाओं की तुलना में उच्च साक्षरता दर दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, जबकि पुरुष साक्षरता दर 75.29% है, महिला साक्षरता दर 47.77% पर बहुत कम है। यह असमानता ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे प्रमुख है, जहां पारंपरिक सामाजिक मानदंड, शैक्षिक संसाधनों तक सीमित पहुंच और आर्थिक बाधाएं महिलाओं के शैक्षिक अवसरों में बाधा डालती हैं। आंकड़ों से साक्षरता दर में क्षेत्रीय भिन्नताओं का भी पता चलता है, जिसमें परतावल जैसे शहरी क्षेत्रों में निचलौल जैसे अधिक ग्रामीण ब्लॉकों की तुलना में उच्च साक्षरता स्तर दिखाई देता है। अध्ययन से पता चलता है कि साक्षरता में इस लैंगिक अंतर को दूर करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाने और विशेष रूप से ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुंच में सुधार के उद्देश्य से लक्षित शैक्षिक नीतियों और कार्यक्रमों की आवश्यकता है। इसके अलावा, यह साक्षरता दर में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और समावेशी शैक्षिक विकास को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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Author(s):
डॉ० ऋषिका वर्मा.
Country:
India
Research Area:
दर्शनशास्त्र
Page No:
123-128 |
शांकरवेदान्त में ‘जीवन्मुक्ति’ का संप्रत्यय
Abstract
भारतीय दर्शन में (चार्वाक को छोड़कर) परम शुभ एवं परम पुरूषार्थ मोक्ष को माना गया है। भारतीय दार्शनिक मोक्ष से कम किसी मूल्य को जीवन का परम शुभ स्वीकार ही नहीं करते हैं। प्राचीन ऋषियों ने तो तात्त्विक प्रश्नों का विवेचन केवल साधन रूप में ही किया है। दार्शनिक चिंतन का मुख्य लक्ष्य जीवन के दुःखों को दूर करना हैं। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न रंग की गायों के दूध का रंग एक ही होता है, उसी प्रकार दार्शनिक आचार्यों के अलग-अलग होते हुए भी उनकी शिक्षाओं का उद्देश्य एक ही हैः जीव को मोक्षदायक ज्ञान प्रदान करना।
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Author(s):
डॉ. मनीष कुमार भारती.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
129-135 |
आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की काव्य-चेतना: संस्कृति, संवेदना और सृजनशीलता का समागम
Abstract
आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की काव्य चेतना में भारतीय संस्कृति, परंपरा, और राष्ट्रीयता का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है । उनकी रचनाओं में भारतीय दर्शन और जीवन मूल्यों का प्रकट होना उनकी गहन वैचारिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव को स्पष्ट करता है । उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता, सामाजिक समस्याओं, आध्यात्मिकता, और मानवीय मूल्यों का संयोजन मिलता है । आचार्य शास्त्री का काव्य भारतीयता की गहराई में उतरता है और राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत है । उनकी कविताएं न केवल समाज को प्रेरित करती हैं, बल्कि उनमें चेतना का बीजारोपण भी करती हैं । उनका काव्य किसी भी प्रकार की विदेशी सत्ता और संस्कृति के अधीनता को नकारता है और भारतीयता को गर्व से अपनाने की प्रेरणा देता है । विष्णुकांत शास्त्री के काव्य में आध्यात्मिक चेतना का विशेष स्थान है । उनकी रचनाओं में भारतीय वेदांत दर्शन, उपनिषदों, और भगवद्गीता के विचारों की झलक मिलती है । शास्त्री जी की कविताएं व्यक्ति को आत्मिक शांति और आंतरिक संतुलन की ओर प्रेरित करती हैं । उनका काव्य समाज की नैतिकता और मूल्यबोध पर भी आधारित है । उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों, और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया । उनके काव्य में व्यक्ति को एक सच्चे मानव बनने की प्रेरणा मिलती है । वे समाज में प्रेम, करुणा, और समरसता की भावना का संदेश देते हैं ।
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Author(s):
कृष्ण कुमार मुक्कड़, डॉ. अखिलेश चास्टा.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
136-140 |
नाथपंथ और गोरख-साहित्य
Abstract
दिए गए आलेख में नाथपंथ और गोरखनाथ के साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक योगदान का विस्तृत विवेचन किया गया है। नाथ परंपरा को एक प्राचीन शैव-आधारित योगपरक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसके आदि प्रवर्तक आदिनाथ (शिव) माने जाते हैं तथा जिसे मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ ने व्यवस्थित एवं व्यापक रूप प्रदान किया। गोरखनाथ ने बौद्ध वज्रयान और वाममार्गी साधनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप हठयोग, ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-निग्रह और मानसिक-शारीरिक शुचिता पर बल दिया। गोरखनाथ का योगदान केवल धार्मिक या साधनात्मक नहीं, बल्कि साहित्यिक और भाषिक भी है। उन्होंने खड़ी बोली और सधुक्कड़ी जैसी लोकाभिमुख भाषा का प्रयोग कर हिंदी को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में गुरु-महिमा, योग-साधना, कुण्डलिनी जागरण, नाड़ी साधना, निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा, उलटबांसी, लोकोक्तियाँ और सामाजिक पाखंड का विरोध प्रमुख विषय हैं। गोरखबानी का संकलन नाथ साहित्य की प्रामाणिक धरोहर माना जाता है। नाथ साहित्य ने लोकभाषाओं, लोकसंस्कृति और संत काव्य पर गहरा प्रभाव डाला तथा भक्तिकालीन ज्ञानमार्गी परंपरा को दिशा प्रदान की। सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते हुए गोरखनाथ की वाणी ने निम्न और उपेक्षित वर्गों को भी वैचारिक संबल दिया। इस प्रकार नाथपंथ और गोरख-साहित्य भारतीय ज्ञान-परंपरा, योग-दर्शन और हिंदी साहित्य के विकास में एक स्थायी, प्रासंगिक और प्रेरणादायक भूमिका निभाते हैं।
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Author(s):
कोमल.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
141-146 |
बल्लभ डोभाल की कहानियों में वृद्ध जीवन की अभिव्यक्ति
Abstract
वृद्धावस्था जीवन का वह समय है। जब अनुभवों का सूर्य अपनी स्वर्णिम लालिमा से वर्तमान को आलोकित करता हुआ प्रतीत होता है और उनकी ज्ञान की शीतल छाया भावी पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शिका बनकर जीवन में उचित-अनुचित का मार्ग प्रशस्थ कराती जाती है। इस समय जब परंपराओं का प्रहरी और जीवन के अनमोल सबक का संवाहक अपने जीवनानुभवों को अपनी अगली पीढी़ को हस्तांतरित करने की स्थिति में होता है तब यह प्रश्न उठता है कि उसका वह अनुभव भावी पीढ़ी के लिए कितना उपयोगी होगा ? समाज का एक क्रूर नियम है कि किसी की उपयोगिता समाप्त होते ही उसकी उपेक्षा होने लगती है यही स्थिति समाज में बुजुर्गों की भी रही है। आधुनिक युग के बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में बुजुर्ग व्यक्तियों की उपेक्षा, उनका अकेलापन और असुरक्षा की छाया में जीवनयापन करने की उनकी विवशता ने उनको भी हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस विसंगति का प्रतिबिंब साहित्य में भी दिखायी देता है। हिंदी साहित्य वृद्धों की समस्याओं को लेकर जागरूक दिखायी देता है। विशेषकर प्रेमचंद इस दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण साहित्यकार रहे हैं। उनके कथासाहित्य में वृद्ध विमर्श उभरता हुआ दिखायी देता है। प्रेमचंद की 'बूढी़ काकी' कहानी में एक वृद्धा की मार्मिक कहानी व्यक्त हुई है। वहीं ज्ञानरंजन की 'पिता' कहानी में पिता-पुत्र के संबंधों में पीढ़ीगत अंतराल को देखा जा सकता है। जिसमें दोनों ही अपने-अपने स्तर पर सही होते हुए भी एक- दूसरे के विपरीत दिखायी देते हैं। नरेंद्र कोहली की 'शटल' कहानी में बच्चे माता- पिता को अलग-अलग करके अपने -अपने साथ ले जाते हैं। इस कहानी में वृद्धावस्था में अपनी इच्छा को घोटकर बच्चों की खुशी के प्रति वृद्ध माता- पिता के समर्पण के भाव का उल्लेख हुआ है। भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत' कहानी में वृद्ध माँ को बेकार वस्तु की भाँति घर में छुपाने का प्रयास चलता है ताकि माँ चीफ के नजरों में न दिखायी दे, परन्तु माँ अनपढ़ होते हुए भी फुलकारी की कला में निपूर्ण होती है, जिससे चीफ प्रभावित होकर (शामनाथ) का प्रमोशन करता है। इस कहानी में पारिवारिक मूल्यों की गिरावट को देखा जा सकता है। वहीं ऊषा प्रियंवदा की 'वापसी' कहानी में सेवानिवृत्त वृद्ध की समस्याओं का वर्णन किया गया है। इस कहानी का नायक नौकरी से रिटायर होने के पश्चात् परिवार में अपनी जगह तलाशता दिखायी देता है, जिस कारण उसे दूसरी नौकरी की तलास करनी पड़ती है। इस प्रकार की अनेक कहानियाँ हिंदी साहित्य में मार्मिक ढंग से लिखी गयी हैं जो वृद्धों के विभिन्न पक्षों व समस्याओं को पाठक तक संप्रेषित करती हैं। वृद्ध जो कभी अपने परिवार और समाज को दिशाबोध कराते थे, आज मौन रहने को मजबूर दिखायी देते हैं। यह शोध पत्र समाज और परिवार के बदलते ताने-बाने को वरिष्ठ साहित्यकार बल्लभ डोभाल के कथा साहित्य के आलोक में वृद्धों की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो ग्रामीण और शहरी परिवेश के साथ-साथ विविध पारिवारिक ढाँचों में उनकी भूमिका और चुनौतियों को दृष्टिगत करता दिखाई देता है।
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Author(s):
कृष्ण कुमार मुक्कड़, डॉ. अखिलेश चास्टा.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
147-151 |
नाथ साहित्य का उद्भव, ऐतिहासिकता और वर्तमान
Abstract
नाथपंथ एक सामाजिक धार्मिक समन्वय संस्था का नाम है। नाथ पंथ के योगिया ने भारत के सामाजिक आर्थिक परिवर्तन में अद्वितीय भूमिका निभाई। नवीन जीवन मूल्यों के माध्यम से पूरे समाज को प्रभावित किया। नाथ पंथ के विषय पर विस्तृत चर्चा इस शोध ग्रंथ में हुई है। नागपंथ भारत की मध्ययुगीन साधना के प्रकाश स्तंभ के रूप में दिखाई पड़ता है। जिसमें लोक कल्याण की लौह प्रज्वलित होती है। नाथ पंथ गोरखनाथ की साहित्य और उनके योगतत्व के ईर्द-गिर्द घूमता है। नाथ पंथ के अनुसार गोरखनाथ सार्वदेशिक और सर्वकालिक है, जिसका प्रभाव संपूर्ण भारतीय समाज के साथ-साथ मध्य एशिया के विस्तृत भूभाग में व्याप्त है। इन भूभाग में नाथ पंथ की महंत-मठ परंपरा का भी अपना महत्व है। गुरु शिष्य परंपरा और योग दर्शन संपूर्ण विश्व की एक आध्यात्मिक चेतना का अमूल्य धरोहर है। नाथ पंथ के आविर्भाव के समय भारत में विघटन और विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ विकसित हो चुकी थी। लेकिन नाथ पंथ ने उसे शनै: शनै: समाप्त करते हुए भारत को एकता के सूत्र में बाँधा। भारत में व्याप्त सामाजिक विकृतियों का खंडन करते हुए आम जनता को अपने योगमार्ग से जोड़ा। नवनाथ और चौरासी सिद्ध भारतीय जीवन पद्धति के वाहक है। गोरखनाथ का नाथ पंथ आगे चलकर संप्रदाय की संकीर्ण मनोवृतियों में बदल गया। अतः नाथपंथ ने योग के माध्यम से तन मन और मनुष्य जन्म को साधने का एक अचूक निशाना दिया। नाथ साहित्य अपने समय के सामाजिक और धार्मिक अनाचारों के विरुद्ध एक मजबूत आवाज था, जिसने हठयोग को केंद्र में रखकर एक ऐसी साधना पद्धति प्रस्तुत की, जो परवर्ती हिंदी साहित्य की ज्ञानमार्गी शाखा के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुई, जिसकी उपादेयता और प्रासंगिकता युग-युगांतर तक रहेगी।
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Author(s):
ज्योति प्रकाश सरोज.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
152-156 |
अशोक के अभिलेखों में पर्यावरण चेतना के विविध आयाम
Abstract
मौर्यकाल भारतीय इतिहास में केवल राजनीतिक एकीकरण का ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के विकास का भी एक महत्त्वपूर्ण चरण रहा है। इस काल में प्रकृति, मानव और अन्य जीवों के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध की अवधारणा स्पष्ट रूप से उभरती है। सम्राट अशोक के अभिलेख इस पर्यावरणीय दृष्टि के सशक्त ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक द्वारा प्रतिपादित धम्म की नीति का मूल आधार अहिंसा, करुणा तथा सभी जीवों के प्रति सह-अस्तित्व की भावना रही है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण संरक्षण पर पड़ा। अशोक के शिलालेखों एवं स्तम्भ लेखों में पशु-हत्या पर नियंत्रण, कुछ जीवों के वध पर प्रतिबन्ध, वृक्षारोपण, औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण, मार्गों के किनारे छायादार वृक्षों की व्यवस्था तथा कुओं और जलाशयों के निर्माण जैसे उल्लेख मिलते हैं। ये व्यवस्थाएँ राज्य द्वारा संचालित पर्यावरणीय नीतियों को दर्शाती हैं। वन, जल तथा पशु-पक्षी संरक्षण के माध्यम से अशोक ने न केवल मानव कल्याण, बल्कि समस्त जीव-जगत की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अशोक के अभिलेखों में निहित पर्यावरण चेतना प्राचीन भारत की उन्नत पर्यावरणीय सोच को प्रतिबिम्बित करती है, जो आज के वैश्विक पर्यावरण संकट के संदर्भ में भी अत्यन्त प्रासंगिक है।
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Author(s):
कु. श्रेया सुचेता पटवर्धन, प्रो. डॉ. संगीता बापट.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
157-162 |
भारतीय वाद्य-संगीत: सितार एवं बांसुरी में नवाचार और योगदान
Abstract
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वाद्य-संगीत का विकास केवल परंपरा का परिणाम नहीं, बल्कि महान कलाकारों की सृजनशील दृष्टि और तकनीकी प्रयोगों का प्रतिफल है। प्रस्तुत लेख में सितार और बांसुरी के विकास का अध्ययन करते हुए पं. रवि शंकर तथा पं. पन्नालाल घोष के योगदान को केंद्र में रखा गया है। सितार की संरचना, तार-व्यवस्था और ध्वनि-विस्तार में पं. रवि शंकर द्वारा किए गए परिवर्तन तथा दो तुंबों वाली सितार के प्रयोग का विश्लेषण किया गया है। साथ ही बांसुरी को लोकवाद्य से शास्त्रीय वाद्य के रूप में स्थापित करने में पं. पन्नालाल घोष द्वारा किए गए रचनात्मक और वादनात्मक परिवर्तनों, विशेष रूप से तीव्र मध्यम हेतु जोड़े गए सातवें छिद्र के महत्व को स्पष्ट किया गया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि इन कलाकारों के योगदान से भारतीय वाद्य-संगीत को नई दिशा और वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
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Author(s):
जैमिनी खानवे.
Country:
India
Research Area:
शिक्षा शास्त्र
Page No:
163-169 |
वैदिक कालीन भारत में शिक्षण पद्धति
Abstract
प्राचीन भारतीय इतिहास में शिक्षा का स्वर्णिम इतिहास रहा है। वैदिक काल में शिक्षा की आदर्श व्यवस्था रही है। वैदिक काल की शिक्षण पद्धति में वेद अध्ययन के साथ ही कौशल आधारित शिक्षा पर भी बल दिया गया है। प्राचीन भारतीय शिक्षण संस्थाएँ, शिष्य के स्वभाव, शील व चरित्र पर विशेष ध्यान देती थीं। प्राचीन भारतीय शिक्षा की भाषा संस्कृत थी। इतिहासकारों को मानना है कि यह लगभग 3500 वर्ष पुरानी है। बटु को स्नातक होने की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न वेदों के मंत्र, सूक्त को स्मृति-बद्ध कर हविर्भाग करना, बाह्य स्वरूप के साथ अंतःकरण की शुद्धि प्रक्रिया के प्रमुख घटक थे। शिक्षण व्यवस्था आदर्श नियम-पालन व्यवस्था पर आधारित थी। परिणामस्वरूप नैतिक रूप से उत्कृष्ट शिक्षा, ज्ञान-विवेक से परिपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करती थी, जो एक सबल-समृद्ध राष्ट्र निर्माण का प्रमुख अवयव बन जाता था। आदर्श समाज की स्थापना के लिए आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण वैदिक कालीन शिक्षा का आधार स्तंभ था। सदाचार और नैतिक मूल्यों पर अधिक बल दिए जाने के कारण वैदिक कालीन शिक्षा प्रभावोत्पादक थी।
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Author(s):
पवन कुमार, तीरथ राज.
Country:
India
Research Area:
भूगोल
Page No:
170-179 |
सुमेरपुर विकासखण्ड (हमीरपुर जनपद) का जनसंख्या वृद्धि एवं घनत्व के आधार पर जनांकिकीय विश्लेषण
Abstract
प्रस्तुत अध्ययन सुमेरपुर विकासखण्ड (हमीरपुर जनपद) में 2001 से 2011 के मध्य जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या घनत्व के स्थानिक प्रतिरूपों का भौगोलिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह शोध पूर्णतः द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है, जिनका संकलन भारत की जनगणना 2001 एवं 2011 तथा जिला जनगणना पुस्तिका, हमीरपुर से किया गया है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य विकासखण्ड स्तर पर जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्तियों, न्याय पंचायत-वार जनसंख्या घनत्व की स्थिति तथा इनके बीच संबंधों को स्पष्ट करना है। विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि सुमेरपुर विकासखण्ड की जनसंख्या वृद्धि दर जनपद की औसत वृद्धि दर से अधिक रही है, जिससे क्षेत्र में जनसंख्या दबाव की स्थिति स्पष्ट होती है। न्याय पंचायत स्तर पर जनसंख्या वृद्धि एवं घनत्व में उल्लेखनीय असमानता पाई गई है, जहाँ कुछ क्षेत्रों में उच्च घनत्व एवं तीव्र वृद्धि के कारण भूमि, जल एवं अन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम घनत्व विकास की संभावनाओं को दर्शाता है। जनसंख्या वृद्धि एवं घनत्व के प्रतिरूप केवल प्राकृतिक वृद्धि तक सीमित न होकर प्रवासन, भौगोलिक स्थिति, भूमि उपयोग एवं आधारभूत सुविधाओं से भी प्रभावित पाए गए हैं। समग्र रूप से यह अध्ययन सुमेरपुर विकासखण्ड में क्षेत्रीय असमानताओं को रेखांकित करता है तथा संतुलित एवं सतत विकास हेतु जनसंख्या आधारित सूक्ष्म-स्तरीय योजना निर्माण की आवश्यकता को प्रतिपादित करता है।