Volume: 3 Issue: 1 (January - March 2026)
| Sr No. | Paper Information |
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Author(s):
अंशिका त्रिपाठी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-9 |
स्त्री अस्मिता का प्रश्न : वाया अक्का महादेवीAbstractहिंदी साहित्य में मध्यकाल की स्त्री कवयित्री मीरा के काव्य से हम सभी परिचित हैं। मीरा के विषय में हिंदी साहित्य के इतिहास में शुक्ल जी ने भी लिखा है और विश्वविद्यालयों में मीरा को एक सशक्त एवं मध्यकाल की नारीवादी स्वर के रूप में पढ़ाया भी जाता है। जिन्होंने कृष्ण के प्रेम में लोकलाज की चिंता नहीं की और प्रेम दीवानी हो घर, संसार त्याग दिया। मीरा को पढ़ने के पहले हमें मध्यकाल और भक्ति परंपरा को समझने के लिए कन्नड़ की कवयित्री अक्का महादेवी को पढ़ना चाहिए। अक्का महादेवी का सम्बन्ध लिंगायत परम्परा से था जिसका उनके वचनों पर प्रभाव देखा जा सकता है। इस लेख में अक्का महादेवी के वचनों के माध्यम से मध्यकाल में नारी की स्थिति पर विचार किया गया है। साथ ही प्रस्तुत लेख अक्का महादेवी के रचना संसार पर भी प्रकाश डालता है। | |
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Author(s):
सुश्री नीलम सेनिया.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
10-14 |
भक्ति आन्दोलन के दादू पन्थ में मुस्लिम संतों का योगदान :- एक विश्लेष्णात्मक अध्ययनAbstractभक्ति आंदोलन का भारतीय समाज को चिंतनशील बनाने में मुख्य भूमिका है। यह विषय उत्तर भारत की संत परंपरा को नयी दृष्टि से मूल्यांकित करने का एक प्रयास है। हिन्दी संत परंपरा में दादू पंथ के मुस्लिम कवियों को जानने का प्रयास है। हिन्दी संत साहित्य में जायसी जैसे बड़े कवि को छोड़ दिया जाए तो अभी तक मुस्लिम संतों पर ठीक से काम नहीं हुआ है, संत साहित्य में उनके योगदानों पर चर्चा होनी अभी शेष है। इसी को केंद्रित कर यह लेख लिखा गया है जिससे दादूपंथ और मुस्लिम सन्तों के कई आयाम सामने आएंगे। इस अध्ययन में दादूपंथी मुस्लिम संतों विशेष रूप से रज्जब, बखना तथा वाजिंद के साहित्य का गंभीरता पूर्वक अध्ययन किया जायेगा, साथ ही हिन्दी संत साहित्य के विकास में इन संतों के योगदान भी रेखांकित किये जायेंगे। | |
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Author(s):
डॉ. मनीष कुमार भारती.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
15-24 |
हिन्दी-उर्दू विवादः संवाद की भाषा से विवाद की भाषा तकAbstractभारत की भाषाई परंपरा का मूल स्वभाव संवाद, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय में निहित रहा है। यहाँ भाषा कभी केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं रही, बल्कि सामाजिक संबंधों को जोड़ने वाली वह जीवंत शक्ति रही है, जिसके माध्यम से विविध धार्मिक आस्थाएँ, जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक अनुभव एक-दूसरे से संवाद करते रहे हैं। उत्तर भारत में सदियों तक प्रचलित वह लोकभाषा—जिसे कभी हिन्दवी, कभी हिन्दुस्तानी और कभी खड़ीबोली कहा गया—जनसामान्य की संवेदना, विचार और व्यवहार की साझा अभिव्यक्ति थी। साधु-संतों की वाणी, सूफी कवियों का प्रेमसंदेश और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्तियाँ इसी भाषा के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचीं। इस भाषा ने न किसी धार्मिक सीमा को स्वीकार किया और न किसी सांस्कृतिक दीवार को; उसका स्वरूप स्वाभाविक रूप से समावेशी और संवादधर्मी था। किन्तु इतिहास की विडंबना यह रही कि यही साझा संवाद-भाषा आगे चलकर हिन्दी और उर्दू के रूप में दो पृथक भाषाई पहचानें ग्रहण करने लगी। यह विभाजन भाषिक विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक हस्तक्षेप और आधुनिक राजनीति की देन था। ब्रिटिश शासन ने प्रशासनिक सुविधा और सत्ता के विस्तार के लिए भाषाओं को वर्गीकृत किया, उन्हें लिपि, शब्दावली और धार्मिक पहचान से जोड़कर अलग-अलग खाँचों में बाँट दिया। परिणामस्वरूप, जो भाषा कभी सांस्कृतिक साझेदारी का माध्यम थी, वही औपनिवेशिक काल में विवाद, विभाजन और राजनीतिक टकराव का कारण बन गई। हिन्दी–उर्दू विवाद वस्तुतः दो भाषाओं के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि सत्ता, पहचान और वर्चस्व की राजनीति से उपजा हुआ संघर्ष है। भाषा यहाँ संप्रेषण का साधन न रहकर सामाजिक अस्मिता और राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक बन गई। हिन्दी को ‘हिन्दू पहचान’ और उर्दू को ‘मुस्लिम पहचान’ से जोड़ने की प्रवृत्ति ने भाषा को संवाद के धरातल से हटाकर टकराव के मंच पर ला खड़ा किया। इस प्रक्रिया में भाषा की मानवीय और सांस्कृतिक भूमिका पीछे छूट गई और वह विवाद का औज़ार बनकर रह गई। | |
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Author(s):
विकास द्विवेदी, डॉ. दिवाकर अवस्थी.
Country:
India
Research Area:
पत्रकारिता
Page No:
25-37 |
स्नातक स्तरीय विद्यार्थियों पर सोशल मीडिया के प्रभावों का अध्ययनAbstractबदलते दौर के साथ आज का स्नातक स्तरीय विद्यार्थी सोशल मीडिया का बड़ा उपयोगकर्ता हैं। शोध दर्शाता है कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, व्हास्ट्सअप, इन्स्टाग्राम, यूटयूब इत्यादि में क्या चल रहा है, स्नातक स्तरीय विद्यार्थी इससे अपडेट होते रहते हैं | आज बात चाहे ऑनलाइन कक्षाओ की हो या विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म से पढाई करने की, उच्च शिक्षा के विद्यार्थी आज अपने आपको सोशल मीडिया प्लेटफार्म से जोड़ चुके हैं| वे आज सोशल मीडिया पर चैटिंग करने से लेकर रील देखकर समय बिताने में भी आगे हैं| प्रस्तुत शोध में स्नातक स्तरीय विद्यार्थियों ने विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त की अध्ययन में उनके जीवन में सोशल मीडिया से पड़ रहे प्रभावों, उन्हें रिलैक्स महसूस कराने, तनाव होने, ज्ञानवर्धक पोस्ट करने, समय बर्बाद करने, मनोरंजन करने जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूंछे गये विद्यार्थियों ने इन प्रश्नों का अपने विवेकानुसार उत्तर दिया और उन्ही जवाबों के आधार पर शोध पत्र तैयार किया गया| इस शोध में बालकों की तुलना में बालिकाओं की संख्या अधिक रही जो सक्रीय महिला भागीदारी को दर्शाता है| शोध में ग्रामीण व शहरी दोनों ही जगहों के स्नातक विद्यार्थियों को शामिल किया गया जिससे की दोनों ही जगहों पर विद्यार्थियों के सोशल मीडिया का सक्रीय उपयोगकर्ता होने का पता चलता है, और ग्रामीण स्नातक विद्यार्थी भी अपनी जरूरत के अनुसार सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं| शोध दर्शाता है कि आज की परिस्थिति में विद्यार्थी जीवन में सोशल मीडिया का उपयोग करना सामान्य बात हो चुकी है, जिसमे वें शैक्षिक उपयोगिता विशिष्ट रूप से शामिल है| साथ ही किस प्रकार यह उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और वह विभिन्न तरीकों से सोशल मीडिया से प्रभावित हैं| निष्कर्षतः स्नातक स्तरीय विद्यार्थियों पर हुए शोध से वर्तमान में विद्यार्थियों पर सोशल मीडिया के प्रभाव जानने में मदद मिली है| कीवर्ड : सोशल मीडिया, विद्यार्थीं, स्नातक विद्यार्थी, विद्यार्थी और सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, सोशल मीडिया और मेंटल स्ट्रेस | |
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Author(s):
जितेन्द्र, डॉ. अंजन कुमार.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
38-42 |
भूमंडलीकरण और मनोज रूपड़ा के उपन्यासों में व्यक्त अकेलापनAbstractअकेलापन एक भावनात्मक एवं मानसिक स्थिति है। जिसमें व्यक्ति अपनों या अपने परिवेश के बीच स्वयं को अकेला महसूस करता है। अकेलापन से जूझ रहा व्यक्ति एक समय बाद घुटन एवं कुंठा का शिकार हो जाता हैl अकेलेपन की भावना से गुजर रहे व्यक्ति को जीवन निरर्थक लगता है। वह एकाकीपन में निरन्तर रिक्तता और उद्देश्यहीनता का अनुभव करता है। अकेलापन आधुनिक सभ्यता की देन है औद्योगिकीकरण और नगरीकरण के प्रभाव से इसका विकास हुआ है। अकेलेपन की अभिव्यक्ति स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य में अधिक दिखाई देती है। भूमंडलीकरण के बाद अकेलेपन की भावना निरंतर बढ़ती गयी है साथ ही इसकी स्थिति पहले से अधिक चिंताजनक हुई है। आज के समय में अकेलापन जीवन की एक प्रमुख समस्या बनती जा रही है। मनोज रूपड़ा ने अपने उपन्यासों में वर्तमान भूमंडलीकरण के संदर्भ में मनुष्य के अकेलेपन को बहुत गहराई के साथ चित्रित किया है। मनोज रूपड़ा के उपन्यास ‘प्रतिसंसार’ के आनंद का अकेलापन पूँजीवाद जीवन शैली के दुष्प्रभाव स्वरूप पारिवारिक विखंडन से ऊपजा अकेलापन है। इसी तरह ‘काले अध्याय’ उपन्यास के नायक के अकेलेपन में भूमंडलीकरण के कारण आदिवासी समुदाय का विखंडन एवं विस्थापन निहित है। इसी उपन्यास में कैप्टन दत्त के अकेलेपन के पीछे अतीत की हिंसक घटनाओं के साथ समकालीन पूँजीवादी व्यवस्था के अनिश्चित, अस्थिर और छद्म भरी प्रवृत्ति कारक है। | |
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Author(s):
डॉ. विनय कुमार सिन्हा.
Country:
India
Research Area:
समाजशास्त्र
Page No:
43-54 |
बिहार में लोकतांत्रिक भागीदारी एवं मतदान निर्णय पर आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावAbstractयह अध्ययन बिहार राज्य में आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के प्रभाव का विश्लेषण करता है, विशेष रूप से चुनावी प्रक्रिया और मतदान निर्णय पर इसके प्रभाव को समझने के लिए। इस अध्ययन में डिजिटल साक्षरता, सोशल मीडिया के चुनाव प्रचार में उपयोग, डिजिटल अभियानों, और सूचना प्रवाह के संदर्भ में मतदाता जागरूकता का मूल्यांकन किया गया है। साथ ही, इस अध्ययन ने ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों के बीच डिजिटल असमानता के प्रभाव को भी उजागर किया है। उपलब्ध द्वितीयक आँकड़ों के आधार पर, यह पाया गया कि बिहार में पिछले कुछ चुनावों में मतदान प्रतिशत में लगातार वृद्धि हुई है, जिसका प्रमुख कारण डिजिटल मीडिया के बढ़ते उपयोग और मतदान के प्रति जागरूकता है। विशेष रूप से, महिला और युवा मतदाताओं की भागीदारी में सुधार देखा गया है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की सीमित पहुँच के कारण वहाँ पर मतदान प्रतिशत और लोकतांत्रिक सहभागिता में कमी पाई गई। अध्ययन ने यह भी दर्शाया कि फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार ने मतदाता निर्णयों को प्रभावित किया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अंत में, यह अध्ययन बिहार में डिजिटल साक्षरता और कनेक्टिविटी में समानता की आवश्यकता पर बल देता है, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और सशक्त किया जा सके। | |
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Author(s):
भगवान साहु.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
55-61 |
दलित आलोचना का स्वरूप और विविध प्रतिमानAbstractहिंदी दलित आलोचना हिंदी साहित्य की एक सशक्त धारा है जिसने परंपरागत आलोचनात्मक सौंदर्यबोध और मानदंडों को चुनौती देकर नए साहित्यिक प्रतिमानों का निर्माण किया है। दलित आलोचना के स्वरूप में दलित लेखकों के अनुभव और सामाजिक न्याय की आकांक्षा केंद्र में है। यही कारण है कि आलोचना में जो प्रतिमान उभर कर सामने आए हैं वह समाजपरक और परिवर्तनकारी है। इसकी मुख्य विशेषताओं में दलित केंद्रित परिप्रेक्ष्य और सामाजिक प्रतिबद्धता है। साहित्य में दलित दृष्टि की सार्थकता को समझने के लिए दलित आलोचना के विभिन्न प्रतिमानों की परख आवश्यक है। दलित साहित्य के अपने सौंदर्य बोध है और यह सौंदर्य बोध पारंपरिक प्रतिमानों से भिन्न दलितों की सोच और व्यवहार से जुड़ा हुआ है। दलित आलोचक इसे इतिहास लेखन की वर्चस्वशाली परंपरा मानते हुए इसे चुनौती देते हैं और संपूर्ण परंपराओं और विरासत का पुनर्मूल्यांकन चाहते हैं। इस क्रम में साहित्य में दलित चेतना के बीज और उसके स्वर की पड़ताल वे स्वयं के मानदंडों, प्रतिमानों और सौंदर्य बोध के आधार पर चाहते हैं। दलित आलोचना की इस परिवर्तनकामी आकांक्षा ने एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। इससे साहित्य के मूल्यांकन का एक नया सौंदर्य शास्त्र विकसित हुआ है। प्रस्तुत शोध आलेख में दलित आलोचना के स्वरूप एवं उसके विविध प्रतिमानों की गहन एवं गवेषणात्मक पड़ताल प्रस्तुत की गई है। | |
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Author(s):
लक्ष्मीन चौहान, डॉ. (श्रीमती) श्रद्धा चंद्राकार.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
62-66 |
संजीव के उपन्यासों में प्रगतिशील चेतना एवं प्रतिरोध का स्वरAbstractहिन्दी साहित्य जगत में समकालीन दौर के बहुप्रतिष्ठित साहित्यकार संजीव का स्थान अग्रणीय एवं अतुलनीय है | सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों तथा समस्याओं को लेकर लेखनी चलाने वाले प्रगतिशील विचारधारा से संबन्धित साहित्यकारों मे संजीव का स्थान अन्यतम है | ग्रामीण तथा शहरी समाज में घटित घटनाओं तथा शोषण का वर्णन इनकी उपन्यासों में बखूबी दर्शाया गया है | पीड़ित, दलित, शोषित, उपेक्षित पात्रों का वर्णन कथावस्तु तथा परिवेश के आधार पर जीवंत रूप में पाठक वर्ग के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है | इनके रचनाओं की महत्वपूर्ण विशेषता रही है, शोधपरख रचनाशीलता | इनकी रचनाओं में प्रगतिवाद का स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है | सामंतवाद, जातिवाद, आदिवासियों का विस्थापन, नारियों का शोषण इत्यादि समस्याओं का यथार्थ वर्णन इनकी उपन्यासों में देखा जा सकता है| तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक मुद्दों व समस्याओं का सजीव वर्णन एवं पात्रों द्वारा प्रतिरोध का स्वर इनकी 'अहेर', 'धार', 'जंगल जहाँ शुरू होता है', 'सूत्रधार', 'पाँव तले की दूब', 'फाँस' इत्यादि उपन्यासों में मुखर रूप से देखा जा सकता है| सामाजिक शोषण तंत्र में व्याप्त भरष्टाचार और कूटनीतियों का तत्कालीन परिवेश में जो वर्णन किया गया है, वह आज के दौर में भी प्र्सांगिक है| निम्नवर्गीय समाज में व्याप्त, जातिवादी मानसिकता व धार्मिक बाह्य आडंबरों को बड़ी ही संजीदगी व बारीकी से इनकी कृतियों में पेश किया गया है| | |
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Author(s):
डॉ. प्रियंका कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
67-70 |
संगीत की उपशास्त्रीय विधाओं का अवलोकनAbstractवैदिक काल से ही भारतीय संगीत की अपनी एक अलग पहचान रही है, जो जनसाधारण को मनोरंजित करता रहा है। यह संगीत अपने-अपने क्षेत्रों में अलग-अलग भाषा लिए होने के अलावा अनेकता में एकता लिए हुए है। समय-समय पर एक-दूसरे स्थानों में इसका प्रचार-प्रसार होता रहा है, जिसमें आज सुलभता के कारण दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट आदि का प्रमुख स्थान है। पंडित शारंगदेव ने गायन, वादन एवं नृत्य की त्रिवेणी को संगीत कहा है, जिसमें गान्धर्व कलाओं में गान को सर्वप्रथम स्थान दिया गया है। संगीत में वाद्ययंत्रों का निर्माण गीत के बाद संगत करने के लिए किया गया। प्राचीनकालीन संगीत का अध्ययन करने से हमें यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में सर्वप्रथम अनिबद्ध गान का प्रचार था, जिसके चार प्रकार प्रचलित थे— रागालाप, रूपकालाप, आलप्ति और स्वस्थान। उसके पश्चात् संगीत में गायन के साथ लय देने के लिए झांझ, मंजीरा, डमरू आदि का प्रयोग किया जाने लगा। धीरे-धीरे उसके साथ वीणा, मृदंग, दरदुर आदि वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग किया जाने लगा, जिससे उसकी गणना निबद्ध संगीत के अंतर्गत होने लगी। | |
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Author(s):
सुरभि रानी, प्रो. स्वस्ति वर्मा.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
71-74 |
बज्जिका लोकगीतों की परम्परा और प्रभावAbstractसंगीत आनंद का अविर्भाव है। संगीत से अध्यात्म प्रकाशित होता है। संगीत ईश्वर का स्वरूप है। मानव ने संगीत प्रकृति से सीखा है। सृष्टि के कण-कण में अलौकिक संगीत व्याप्त है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि का जन्म ही नाद के कारण हुआ। सृष्टि को ‘नादेन जायते’ कहा गया है। पंडित शारंगदेव ने अपने ग्रंथ संगीत रत्नाकर में नाद का वर्णन करते हुए लिखा है— “ब्रह्मा नाद रूपो स्मृतः।” अर्थात इन्होंने परमपिता ब्रह्मा को नाद के रूप में स्वीकार किया है। नाद की गणना संगीत के आधारभूत तत्त्वों में की जाती है और सारा जगत को नाद के ही अधीन माना गया है। विद्वानों के अनुसार संगीत के द्वारा मनुष्य प्राचीन काल से ही मनोरंजन की प्राप्ति करता आ रहा है। प्राचीन काल में संगीत मनोरंजन के साथ-साथ मुक्ति प्राप्त करने का भी एक प्रमुख साधन था। सामान्यतः मुक्ति-प्राप्ति के उद्देश्य से जिस संगीत का गायन किया जाता था, उसे मार्गी संगीत के नाम से जाना जाता है और मनोरंजन के उद्देश्य से जिस संगीत का प्रयोग किया जाता था, उसे लौकिक संगीत के नाम से संबोधित किया गया है। लौकिक संगीत के अंतर्गत गाए जाने वाले गीत ही आगे चलकर लोकगीतों के नाम से प्रचलित हुए, जिनका गायन आज के समय में साधारण या सामान्य लोगों के द्वारा किया जाता है। इन लोकगीतों के अंतर्गत भिन्न-भिन्न प्रदेशों एवं क्षेत्रों में नाना प्रकार के लोकगीतों का गायन किया जाता है। इन लोकगीतों का एक प्रचलित एवं प्रसिद्ध प्रकार है बज्जिका लोकगीत, जिसका वर्णन इस शोध-पत्र में मैं भली-भांति करने का प्रयास कर रही हूँ। | |
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Author(s):
डॉ.सुरिन्द्र सिंह.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
75-81 |
जूठनः आत्मकथात्मक लेखन में दलित अनुभव का दस्तावेज़Abstract"जूठन" ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा रचित एक प्रभावशाली दलित आत्मकथा है, जो भारतीय समाज में जातिवाद, अस्पृश्यता और गरीबी के यथार्थ को उजागर करती है। यह कृति दलित समुदाय के संघर्ष, अपमान और आत्म-सम्मान की कहानी है। लेखक ने अपने जीवन के कष्टदायक अनुभवों को साझा करते हुए यह दिखाया कि कैसे दलितों को सवर्ण समाज द्वारा अपमानित किया जाता है और उनका शोषण किया जाता है। पुस्तक में जूठन का प्रतीक जातिवाद और दलितों के प्रति घृणा और असमानता का है, जब बची-खुची रोटियाँ या गंदा भोजन उन्हें दिया जाता था। इस आत्मकथा के पहले खंड में लेखक ने अपनी बचपन की कष्टमय परिस्थितियों का उल्लेख किया है, जहां उन्हें स्कूल में शारीरिक और मानसिक शोषण का सामना करना पड़ा। दूसरे खंड में लेखक ने अपने जीवन के संघर्षों, अस्वस्थता और समाज में दलितों के प्रति मानसिकता को विस्तार से बताया। "जूठन" दलित समाज की पीड़ा और उनकी अनकही कहानियों को सामने लाती है। यह आत्मकथा दलित चेतना को जागृत करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है, जो समाज में बदलाव की आवश्यकता को व्यक्त करती है। | |
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Author(s):
डॉ. गुलाब सिंह यादव.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
82-88 |
राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिकाAbstractउन्नीसवीं शताब्दी से आरंभ होकर स्वतंत्रता आंदोलन तक हिन्दी पत्रकारिता ने भारतीय समाज में जन-जागरण, सामाजिक सुधार और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिन्दी पत्रकारिता का आरंभ 1826 ई. में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन से माना जाता है, जिसने हिन्दी भाषा को समाचार और विचार की अभिव्यक्ति का माध्यम प्रदान किया। भारतेन्दु युग में पत्रकारिता ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना को बल दिया, जबकि द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी के नेतृत्व में पत्रकारिता को वैचारिक अनुशासन और सामाजिक चेतना प्राप्त हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के काल में महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी तथा अन्य राष्ट्रवादी पत्रकारों ने अपने लेखन के माध्यम से जनता में स्वाधीनता, स्वदेशी और आत्मसम्मान की भावना को सुदृढ़ किया। ब्रिटिश शासन द्वारा लगाए गए विभिन्न प्रेस कानूनों और दमनकारी नीतियों के बावजूद हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया और जनता को स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार हिन्दी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में वैचारिक दिशा, नैतिक ऊर्जा और संगठनात्मक शक्ति प्रदान की तथा स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः इस शोध के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि हिन्दी पत्रकारिता केवल सूचना का साधन नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्रीय चेतना के निर्माण की आधारशिला और स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक धुरी थी। | |
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Author(s):
डॉ. हेमलता कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
89-93 |
लोकगीत में ऋतुगीतों का महत्त्वAbstractलोकगीतों का प्रकृति के साथ गहरा संबंध है। लोकगीतों का जन्म तब हुआ, जब शहरी सभ्यता का विकास नहीं हुआ था और सामान्यतः लोग प्रकृति के प्रांगण में निर्द्वंद्व विचरण करते थे। भारतवर्ष में प्रकृति छह बार अपना रूप परिवर्तित करती है, जिससे ऋतु की संज्ञा दी जाती है। यहाँ छह ऋतुओं में ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमंत तथा बसंत हैं। हर ऋतु का अपना आनंद तथा महत्व है। भारतीय समाज सदियों से प्रत्येक ऋतु का जिन गीतों के माध्यम से स्वागत, सत्कार और अभिनंदन करता आया है, उन गीतों को ऋतु गीत कहते हैं। विशेष रूप से लोकगीतों का महत्व हमेशा बसंत और ग्रीष्म ऋतु से जुड़ा है। ऋतु गीतों में ऋतु विशेष में होने वाले उत्सव, त्योहारों, पर्वों एवं मेलों से संबंधित गीतों का वर्णन रहता है। प्रत्येक ऋतु के साथ मानव का बाह्य और आंतरिक परिवेश बदलता है। लोकगायक जहाँ बाहरी प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का सूक्ष्म निरीक्षण कर अपनी कलम चलाता है, वहीं मानव मन पर पड़ने वाले प्राकृतिक परिवर्तन के प्रभाव को भी अंकित करता है। बसंत में शृंगार एवं हास्य, ग्रीष्म में वीर एवं रौद्र, वर्षा ऋतु में करुण एवं विरह, भयानक-वीभत्स तथा शरद में शांत और वात्सल्य रस का बाहुल्य लोकगीतों में रहता है। लगभग सभी भारतीय भाषाओं में बारहमासा लिखने की लोक परंपरा जीवित है। हिमाचल की विभिन्न बोलियों में भी इसका स्वरूप देखा जा सकता है। | |
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Author(s):
प्रवीण कुमार, प्रो. नीरा चौधरी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
94-97 |
मिथिला के लोकगीतों का अवलोकनAbstractहिमालय के पादप्रदेश में कोसी से पश्चिम, गंडक से पूर्व और गंगा से उत्तर विदेह जनपद और राजधानी नगर ‘मिथिला’ आजकल एक सांस्कृतिक जनपद के रूप में अवशिष्ट है। इस भूभाग की प्राकृतिक सुषमा, ऐतिहासिक गौरव एवं सांस्कृतिक अंतर्धारा से समृद्ध है। यहाँ के जीवन में लौकिक एवं वैदिक संस्कृति का समाहार लोकवेद में दृष्टव्य है। ‘लोकगीत’ लोक के गीत हैं, जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा समाज अपनाता है। मिथिला विश्व के महान सांस्कृतिक धरोहर क्षेत्रों में से एक प्रमुख क्षेत्र है। यहाँ की धरती खाद्यान्न के लिए उर्वरा तो है ही, संतान-गर्भा भी है। इसका सांस्कृतिक, खासकर शैक्षणिक इतिहास हजारों साल का है। इस विद्या-क्षेत्र का गौरव वेदों में वर्णित है। जनक, सीता, याज्ञवल्क्य, कपिल, पक्षधर मिश्र, चण्डेश्वर, गार्गी, मैत्रेयी, लखिमादेई और विद्यापति जैसे संतानों को जन्म देने का गौरव इस धरा को है, जिन्होंने अपनी कृतियों से विश्व को हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी बना दिया। विद्यानुरागी यह क्षेत्र सदा से रहा है। विद्वान और सामान्य जनता के बीच जैसा तारतम्य और आपसी समझदारी यहाँ है, शायद ही कहीं मिले। यहाँ के रीति-रिवाज में लोक और शास्त्र का बेजोड़ संगम देखने को मिलता है। | |
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Author(s):
डॉ. रेखा कुर्रे.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
98-102 |
‘उत्कोच’ उपन्यास में प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक चेतनाAbstractप्रस्तुत शोध जयप्रकाश कर्दम द्वारा रचित उपन्यास ‘उत्कोच’(2019) के माध्यम से समकालीन भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों और उसके बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण करता है। भ्रष्टाचार आज केवल एक प्रशासनिक व्याधि न रहकर भारतीय जीवन-शैली का एक अनिवार्य और विडंबनापूर्ण अंग बन चुका है। समाज में जहाँ एक ओर सार्वजनिक मंचों पर भ्रष्टाचार का विरोध होता है, वहीं व्यक्तिगत स्तर पर इसे 'व्यावहारिक तर्क' के आधार पर स्वीकार्यता प्राप्त है। उपन्यास का नायक 'मनोहर' इस भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध एक नैतिक प्रतिरोध के रूप में उभरता है, किंतु उसकी यह सैद्धांतिक और व्यावहारिक ईमानदारी उसे सामाजिक निर्वासन की ओर धकेल देती है। लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से यह रेखांकित किया है कि एक आदर्शवादी व्यक्ति को न केवल कार्यस्थल (दफ्तर) में सवर्ण सहकर्मियों के जातिगत द्वेष, उपहास और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, बल्कि उसके निजी और पारिवारिक संबंध भी इस संघर्ष की भेंट चढ़ जाते हैं। आर्थिक विपन्नता और व्यवस्थागत क्रूरता का चरम तब परिलक्षित होता है, जब उचित उपचार के अभाव में मनोहर की पत्नी की मृत्यु हो जाती है। यह उपन्यास केवल भ्रष्टाचार की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आरक्षण के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह, जाति-व्यवस्था की गहरी पैठ और दफ्तरी राजनीति में व्याप्त भेदभाव को भी पूरी गहराई से उजागर करता है। निष्कर्षतः, जयप्रकाश कर्दम ‘उत्कोच’ के माध्यम से एक ऐसे यथार्थ का चित्रण करते हैं जहाँ ईमानदारी की कीमत व्यक्तिगत क्षति और सामाजिक अलगाव के रूप में चुकानी पड़ती है। | |
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Author(s):
डॉ. शची सिंह, योगिता वर्धन.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
103-108 |
मनीषा कुलश्रेष्ठ के कथा साहित्य में स्त्री अस्मिता और यथार्थबोध : कहानियों और उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययनAbstractप्रस्तुत शोध-पत्र मनीषा कुलश्रेष्ठ के कथा साहित्य में स्त्री अस्मिता और यथार्थबोध के बहुआयामी स्वरूप का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। समकालीन हिंदी साहित्य में मनीषा कुलश्रेष्ठ एक ऐसी लेखिका के रूप में उभरी हैं जिन्होंने स्त्री को एक विचार, संवेदना और जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने कथा साहित्य में स्त्री के अनुभवों को प्रेम, यौनिकता, मातृत्व, अकेलेपन, मानसिक स्वतंत्रता और सामाजिक विसंगतियों जैसे विविध पक्षों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि जहाँ उनकी कहानियाँ प्रतीकात्मकता, संवेदनशीलता और तीव्रता लिए हुए हैं वहीं उनके उपन्यास वैचारिक गहराई, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक विमर्श के साथ एक विस्तृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। अतः यह शोध-पत्र मनीषा कुलश्रेष्ठ के कथा साहित्य को स्त्री मुक्ति और अस्मिता की खोज के साथ समकालीन समाज की विसंगतियों के एक गंभीर और सूक्ष्म विश्लेषण के रूप में भी रेखांकित करता है। | |
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Author(s):
डॉ. नीता त्रिवेदी, शक्ति वर्धन आर्टिस्ट.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
109-114 |
गीताश्री की कहानियों में स्त्री अस्मिता, अधिकार और आत्मनिर्णय की चेतना : एक स्त्रीवादी दृष्टिकोणAbstractयह शोध-पत्र समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की प्रमुख लेखिका गीताश्री की कहानियों में उपस्थित स्त्री अस्मिता, अधिकार और आत्मनिर्णय की चेतना का स्त्रीवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। भारतीय समाज की पारंपरिक पितृसत्तात्मक संरचना ने स्त्री को सदैव एक सीमित भूमिका में बाँधने का प्रयास किया है जहाँ उसकी देह, उसकी यौनिकता, उसकी इच्छा और उसके निर्णय सभी समाज की स्वीकृति पर निर्भर माने गए हैं। किंतु गीताश्री की कहानियाँ इस संरचना को भीतर से चुनौती देती हैं। यह अध्ययन इस बात पर विशेष बल देता है कि गीताश्री की स्त्रियाँ विद्रोह की पारंपरिक छवि को त्यागकर एक आंतरिक, सूक्ष्म और गहरे स्तर पर प्रतिरोध रचती हैं। यह प्रक्रिया केवल साहित्यिक कल्पना नहीं बल्कि स्त्री अनुभव की सामाजिक, वैचारिक और संवेदनात्मक यथार्थता को प्रतिबिंबित करती है। | |
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Author(s):
राघवेंद्र कुमार यादव, डॉ. राणा प्रताप यादव.
Country:
India
Research Area:
भूगोल
Page No:
115-124 |
कुमाऊं मंडल में पलायन को कम करने में पर्यटन की भूमिका: एक भौगोलिक विश्लेषणAbstractयह शोध पत्र कुमाऊं मंडल में पलायन को रोकने में पर्यटन की भूमिका का भौगोलिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित रोजगार अवसर, भौगोलिक दुर्गमता, अवसंरचना की कमी तथा संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग के कारण ग्रामीण जनसंख्या का निरंतर पलायन हो रहा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक निरंतरता प्रभावित हो रही है। प्रस्तुत अध्ययन में 2015–2024 की अवधि के पलायन आँकड़ों तथा 2023–24 के पर्यटन आँकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में स्पीयरमैन रैंक सहसंबंध विधि का प्रयोग करते हुए पर्यटन और पलायन के मध्य संबंध का परीक्षण किया गया, जिसमें निम्न स्तर का नकारात्मक सहसंबंध (ρ ≈ –0.26) प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि जिन जनपदों में पर्यटन अपेक्षाकृत विकसित है, वहाँ पलायन की प्रवृत्ति कम पाई गई, जबकि कम विकसित पर्यटन क्षेत्रों में पलायन अधिक देखा गया। नैनीताल जैसे उच्च पर्यटन वाले जनपद में पलायन न्यूनतम पाया गया, जबकि बागेश्वर एवं चम्पावत जैसे जनपदों में पर्यटन की कमी के कारण पलायन अधिक रहा। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि पर्यटन स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, आय वृद्धि, सांस्कृतिक संरक्षण तथा क्षेत्रीय विकास के माध्यम से पलायन को आंशिक रूप से नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। तथापि, पलायन की समस्या के स्थायी समाधान हेतु पर्यटन के साथ-साथ आधारभूत संरचना के विकास, स्थानीय संसाधनों के समुचित उपयोग तथा प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। अतः स्थान-विशिष्ट पर्यटन विकास रणनीतियाँ कुमाऊं मंडल में सतत विकास एवं पलायन न्यूनीकरण के प्रभावी साधन सिद्ध हो सकती हैं। | |
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Author(s):
अनुभव सिंह.
Country:
India
Research Area:
इतिहास
Page No:
125-133 |
महाभारत में युद्ध और शांति की अवधारणाः भारतीय सामरिक चिंतन का दार्शनिक आधारAbstractप्रस्तुत शोध-पत्र में महाभारत में निहित युद्ध और शांति की अवधारणाओं का दार्शनिक तथा सामरिक दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। महाभारत को केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक ग्रंथ न मानकर, इसे भारतीय सामरिक चिंतन के आधारभूत स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि महाभारत में युद्ध को “धर्मयुद्ध” के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका उद्देश्य न्याय की स्थापना और अधर्म का विनाश है। साथ ही, युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में स्वीकार किया गया है, जबकि शांति को सर्वोच्च आदर्श माना गया है। शोध में यह भी बताया गया है कि युद्ध के संचालन हेतु नैतिक नियम निर्धारित थे, जो इसे मर्यादित और मानवीय बनाते थे। श्रीकृष्ण के सामरिक दृष्टिकोण के माध्यम से कूटनीति, नैतिकता और शक्ति के संतुलन को समझाया गया है। पांडवों द्वारा बार-बार शांति प्रयास इस बात को प्रमाणित करते हैं कि संवाद और समझौता भारतीय परंपरा में प्राथमिक साधन रहे हैं। अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि महाभारत में युद्ध और शांति की अवधारणाएं केवल ऐतिहासिक घटनाएं नहीं, बल्कि एक व्यापक दार्शनिक ढांचा हैं, जो आधुनिक वैश्विक संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। यह भारतीय सामरिक चिंतन को नैतिकता और कर्तव्य पर आधारित एक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करता है। | |
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Author(s):
डॉ. अमनदीप कौर.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
134-139 |
हिन्दी सूफी साहित्य में प्रेम के विविध पक्षAbstractहिन्दी सूफी साहित्य में प्रेम को जीवन और साधना का मूल आधार माना गया है। सूफी साहित्य में प्रेम केवल एक भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि आत्मा की परम सत्य की ओर यात्रा है। यह प्रेम इश्क.ए.मजाजी से आरंभ होकर इश्क.ए.हकीकी के रुप में विकसित होता है। सूफी कवियों जैसे मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन और मंझन ने प्रेम को आत्मा और परमात्मा के मिलन का माध्यम बताया है। इस साहित्य में विरह की वेदना, मिलन का आनंद, त्याग, समर्पण की साधना और मानवतावादी दृष्टि के माध्यम से प्रेम के विविध रूपों का चित्रण मिलता है। सूफी प्रेम सीमाओं को तोड़कर मानवता, सहिष्णुता और एकता का संदेश देता है। सूफी साहित्य में विरह को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि विरह की पीड़ा आत्मा को शुद्ध करती है और उसे परमात्मा से मिलन के लिए प्रेरित करती है। वहीं मिलन को आनंद और आत्मिक ऐकता का प्रतीक माना गया है। इस प्रेम में त्याग, समर्पण और अहंकार का विसर्जन आवश्यक है। सूफी प्रेम का स्वरूप् अत्यंत व्यापक और मानवतावादी है, जो जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर समस्त समाज को एक सूत्र में बांधता है। इस प्रकार हिन्दी सूफी साहित्य में प्रेम एक साधना, एक दर्शन और एक जीवन मूल्य के रुप में स्थापित होता है, जो मनुष्य को सत्य, शांति और ईश्वर की ओर अग्रसर करता है। | |
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Author(s):
डॉ. अंजु बाला.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
140-145 |
हिंदी आत्मकथाओं में जीवन-संघर्ष: सामाजिक यथार्थ और आत्मानुभूति का साहित्यिक अध्ययनAbstractहिंदी साहित्य में आत्मकथा-विधा व्यक्ति के जीवनानुभवों, संघर्षों और सामाजिक यथार्थ का सशक्त दस्तावेज़ है। आत्मकथाएँ केवल निजी जीवन का विवरण नहीं होतीं, बल्कि वे अपने समय, समाज, वर्ग, जाति और लिंग संबंधी संरचनाओं का भी विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। इस शोध-पत्र में मैंने हिंदी की प्रमुख आत्मकथाओं—जैसे क्या भूलूँ क्या याद करूँ, जूठन, अपने-अपने पिंजरे तथा कस्तूरी कुंडल बसे—के आधार पर जीवन-संघर्ष की प्रकृति और उसके साहित्यिक रूपांतरण का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि हिंदी आत्मकथाएँ व्यक्तिगत वेदना को सामूहिक अनुभव में रूपांतरित कर सामाजिक परिवर्तन का आधार बनती हैं। हिंदी आत्मकथाएँ केवल साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण और परिवर्तन का सशक्त माध्यम हैं। आत्मकथाएँ यह भी सिखाती हैं कि संघर्ष के बावजूद मानवीय मूल्यों—सत्य, आत्मसम्मान, धैर्य और साहस—को बनाए रखना संभव है। हिंदी आत्मकथाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योकि वे हाशिए के स्वरों को केंद्र में लाती हैं। सामाजिक असमानताओं को चित्रित करती हैं। प्रतिरोध और चेतना को प्रेरित करती हैं। इतिहास को वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं और समाज में नैतिक तथा वैचारिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती हैं।हिंदी आत्मकथा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व आत्मानुभूति है, क्योंकि यही वह आधार है जिसके माध्यम से लेखक अपने जीवन के अनुभवों को साहित्यिक संवेदना और सामाजिक दृष्टि के साथ अभिव्यक्त करता है। | |
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Author(s):
कृष्णा सरदार, डॉ. जैस्मिन पटनायक.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
146-150 |
भारतीय संस्कृति और साहित्य का अंत: संबंधAbstractभारतीय संस्कृति और साहित्य का गहरा और अटूट संबंध है। भारतीय संस्कृति विभिन्न धर्मों, परंपराओं, भाषाओं और कलाओं का समावेश करती है, जबकि साहित्य न केवल संस्कृति का दर्पण है, बल्कि इसे दिशा देने और विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो समाज की चेतना, विचारधारा और मूल्यों को व्यक्त करता है। भारतीय साहित्य विभिन्न भाषाओं में समृद्ध हुआ है, जैसे हिन्दी, संस्कृत, तमिल, बंगाली आदि जो क्षेत्रीय संस्कृतियों को दर्शाते हैं। संस्कृति मानव समाज की पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसकी एकता, सामरिकता और विविधता को बनाए रखने में मदद करती है। साहित्य संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है जो भाषा के माध्यम से व्यक्ति की भावनाओं, विचारों और अनुभवों को साझा करता है। प्राचीन कल से लेकर आधुनिक युग तक साहित्य ने सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक परिवर्तनों और दार्शनिक विचारधाराओं को अभिव्यक्त किया है। वेद, उपनिषद, महाकाव्य, भक्ति साहित्य और आधुनिक साहित्य सभी ने समाज को दिशा देने का कार्य किया है। भारतीय साहित्य सदियों से संस्कृति के संवाहक के रूप में कार्य करता आया है, जिसमें धार्मिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक और सामाजिक तत्वों की गहरी झलक मिलती है। साहित्य और संस्कृति दोनों एक – दूसरे को प्रभावित और समृद्ध करते है, जिससे भारतीय सभ्यता सतत विकासशील बनी रहती है। बीज शब्द - भारतीय संस्कृति, साहित्य, परंपरा, समाज, सांस्कृतिक मूल्य। | |
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Author(s):
डॉ. रेखा कुमारी.
Country:
India
Research Area:
संगीत
Page No:
151-154 |
फिल्मी शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गीतों में लोकधुनों का प्रभावAbstractवर्तमान काल में चित्रपट संगीत का प्रचलन अत्यंत ही व्यापक ढंग से किया जाता है। आधुनिक समय में सम्पन्न होने वाले प्रत्येक कार्यक्रम, चाहे किसी भी प्रकार का हो, उसमें संगीत के बिना रंगत ही नहीं आती है। यह प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। प्राचीन काल में भी समाज में संगीत की तीन धाराओं का प्रचलन था, जिन्हें पूर्ण धार्मिक, पूर्ण लौकिक और धार्मिक-लौकिक के नाम से जाना जाता है। धार्मिक संगीत को मार्गी संगीत या सामगान के समतुल्य माना गया है। लौकिक संगीत की तुलना देशी संगीत या गाथा-गान से की गई है। यही देशी संगीत वर्तमान समय में उपशास्त्रीय संगीत के नाम से प्रचलित हुआ। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक उपशास्त्रीय संगीत का प्रचलन बहुत ही सुंदर तरीके से समाज में स्वतंत्र रूप से किया जाता था। 19वीं शताब्दी के मध्य में संगीत के एक नए प्रकार का उदय हुआ, जिसे फिल्म संगीत के नाम से जाना जाता है। फिल्म संगीत के प्रारंभिक चरणों में अधिकतर शास्त्रीय गायकों ने उसे आगे बढ़ाने में योगदान दिया, जिसके कारण आज भी पुराने फिल्म संगीत में रागदारी लोकसंगीत की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। | |
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Author(s):
डॉ. रमा शंकर, डॉ. सुरेंद्र कुमार.
Country:
India
Research Area:
भूगोल
Page No:
155-162 |
जनपद प्रयागराज (उ0प्र0) में सिंचाई साधनों की स्थितिः प्रतिदर्श चयनित ग्रामों के आधार पर एक विश्लेषणAbstractमानव समाज की समस्त आर्थिक क्रिया किसी न किसी रूप में जल आपूर्ति की अपेक्षा करती है, लेकिन कृषि के सन्दर्भ में इसका विशेष महत्व है, क्योंकि कृषि कार्य पूर्णतः जल आपूर्ति पर ही निर्भर करता है। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में फसलों के विकास के लिए सिंचाई अत्यंन्त महत्वपूर्ण है। सिंचाई हेतु जल का उपयोग कैसे हो कितना हो और कहाँ हो आदि भौगोलिक संरचना एवं दशाओं पर आधारित होता हैं। धरातलीय एवं भूमिगत जल स्रोतों से प्राप्त जल को कृत्रिम विधियों द्वारा खेतों में प्रावाहित करके फसल उत्पादन हेतु मिट्टी को नम करने की पद्धति को सिंचाई के नाम से जाना जाता है। भारत का 92 प्रतिशत उपयोग योग्य जल कृषि में खपत हो जाता है, अधिकतर भाग सिंचाई में प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान बढ़ती जनसंख्या के कुशल भरण पोषण के लिए पर्याप्त खाद्यान की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर विश्व तापमान में वृद्धि तथा मानसून की अनिश्चितता के फलस्वरूप कृषि उत्पादन में सिंचाई की जरूरत कहीं अधिक बढ़ जाती है, वर्षा जल आधारित कृषि क्षेत्रों में कमजोर मानसून के दौरान सूखे की स्थिति हो जाती है जिससे फसल का कम उत्पादन होता है या फिर फसल नष्ट हो जाती है। सिंचाई के साधनों की उपयोगिता कृषकों के सामाजिक-आर्थिक एवं तकनीकी स्तर पर निर्भर करती है, साथ ही क्षेत्र विशेष के सामाजिक व आर्थिक विकास की संभावनाएँ जल से ही निर्धारित होती है। अतः विपुल उत्पादन हेतु आधुनिक तकनिकों द्वारा सिंचाई, कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य जनपद प्रयागराज में वर्गवार सिंचाई साधनों की स्थिति का प्रतिदर्श चयनित ग्रामो के आधार पर विश्लेषण करना है। संकेत शब्दः सिंचाई साधनों की स्थिति, प्रतिदर्श चयनित परिवारों का सामाजिक वर्गो के अनुसार विश्लेषण | |